जालंधर ( संजय कालिया)

किसी कारण वश चंडीगढ़ आया था। कुदरती बस ट्रिब्यून चौक से सीधे इंडस्ट्री एरिया से हो कर 17 सैक्टर जाने लगी। मेरी आंखों में एक बहुत पुरानी पिक्चर घूम गई। दरअसल 1966 में श्री सूद साहिब जी (काल्पनिक नाम) की चंडीगढ़ में किसी मल्टीनेशनल कंपनी में नौकरी थी। मैं उस समय राजपुरा पंजाब में दूसरी कक्षा में पढ़ता था। सूद साहिब (काल्पनिक नाम) जी ने किसी तरीके जुगाड़ लगाया और उन्हें चंडीगढ़ के सैक्टर 30 में रहने के लिए बी-58 मकान मिल गया। कुछ समय बाद पिता जी मेरी माता, एक दो महीने की मेरी बहन को चंडीगढ़ में शिफ्ट कर दिया। कुल मिलाकर शायद हम लोग कुछ महीने ही चंडीगढ़ में रहे थे लेकिन यह कुछ महीने ज़िन्दगी भर के लिए यादगार बन गए है।
आज जब बस सैक्टर 30 के सामने से गुज़री तो मैं रास्ते में उतर गया और अपने उसी मकान को देखने की इच्छा हो गई। 1966 में ही जब हम ने मकान छोड़ा था तो उसके बाद भी हम बहुत बार इस मकान को देखने आते रहे हैं। लेकिन इस बार शायद 18,20 साल बाद मुझे अपना पुराना मकान देखने को मिल रहा था। मैं कुछ भावुक भी हो गया था क्योंकि इस बार जब मैं मकान देखने को गया तो बदकिस्मती से अब न तो मेरे माता-पिता जी हैं और न ही मेरी बहन है। तो मुझे आज बहुत सारी बातें याद आईं हैं जो मैं शेयर करना चाहता हूं।
1966 में चंडीगढ़ में 30 तक ही सैक्टर थे। हम लोग जहां से बस पकड़ते थे, उस को नगला बस स्टैंड कहते थे। तब कहते थे कि चंडीगढ़ में सांप बहुत निकलते हैं।
चंडीगढ़ में मैंने पहली बार फ्लश वाली लेटरिंग देखी थी। पहली बार बाथरूम देखा जिस में पानी अपने आप आता था।
हमारे पास एक बिजली वाला रेडियो होता था। विविध भारती चंडीगढ़ बहुत सुनते थे। सुबह सुबह रेडियो स्टेशन की धुन मुझे बाद में हमेशा चंडीगढ़ की याद दिलाती रही है।

राजपुरा पंजाब से घोड़ा रेहड़ी पर घर का सामान ले कर हम चंडीगढ़ आये थे। एक बार हमें कपड़े धोने के लिए लोहे वाले टब की ज़रूरत महसूस हुई तो हमारे पिता जी ने राजपुरा ख़त लिखा कि हमें टब चाहिए तो एक मेरे दादा जी राजपुरा पंजाब से बस में टब उठा कर चंडीगढ़ देने आए थे।

चंडीगढ़ राजपुरा का बस का किराया शायद 30 या 35 पैसे था।

बिजली वाले पंखे का भी पहली बार चंडीगढ़ में मजा लिया था। राजपुरा में 1966 में हमारे घर बिजली तो थी लेकिन पंखे नहीं थे।

राजपुरा में हमारे घर कोयले की अंगीठी या लकड़ी जला कर रसोई का काम होता था लेकिन चंडीगढ़ में पहली बार मिट्टी के तेल वाला स्टोव देखा था।
चंडीगढ़ में पहली बार नाश्ते में परौंठे के मक्खन खाया था।

कभी कभी पिता जी दफ़्तर की कार द्वारा घर आया करते थे तो मुझे ऐसे लगता था कि हमने कार खरीद ली है।

पहली बार किसी एक पड़ोसी मनचंदा परिवार के घर कस्टर्ड खाया था।

चंडीगढ़ में हमारे पास साईकिल भी था, यह एक बहुत बड़ी बात थी।

चंडीगढ़ में 1966 में लोकल दो डबल डेकर बसें भी चलती थीं। मैंने देखी हैं।

चंडीगढ़ में हमारे साथ मेरा एक चाचा भी रहा करता था जो मुझ से 5 साल बड़ा था। बाद में वो लापता हो गया था।

मेरा चंडीगढ़ में किसी स्कूल में दाखिला होने वाला कि पिता जी को जालंधर में एक अच्छी नौकरी मिल गई और हम लोग वापस राजपुरा आ गये।

कुछ समय बाद हम लोग राजपुरा से फ़गवाड़ा शिफ्ट हो गए। हमारे घर में बाद में इस विषय पर बहुत बार बात हुई कि क्या चंडीगढ़ छोड़ना ठीक था या नहीं।

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