जालंधर : दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान द्वारा बिधिपुर आश्रम में भव्य स्तर पर सत्संग भंडारे का आयोजन किया गया। जिसमें दिव्य गुरु श्री आशुतोष महाराज जी के शिष्य स्वामी परमानंद जी ने कार्यक्रम में आए हुए सैंकड़ों श्रद्धालुओं को गुरु की दिव्य प्रेरणाओं के द्वारा प्रेरित किया।
स्वामी जी ने बताया कि सदगुरु वह उस परम चेतना का द्वार है जो शिष्य को अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। शास्त्रों में गुरु की महिमा को ईश्वर से भी ऊपर स्थान दिया गया है, क्योंकि ईश्वर का ज्ञान भी गुरु की कृपा के बिना संभव नहीं है। सदगुरु की कृपा आध्यात्मिक जीवन की आधारशिला है। वह उस पारस पत्थर के समान हैं जो लोहे रूपी शिष्य को कंचन बना देते हैं। शास्त्र कहते हैं कि सौभाग्य से मनुष्य जन्म मिलता है, एक मानव पर ईश्वर की कृपा की प्रमाण यही है , कि उसे एक पूर्ण सदगुरु की प्राप्ति होती है। स्वामी जी ने कहा संसार का असूल है मजदूरी के बदले तनख्वाह। यह नियम सद्गुरु के साम्राज्य में भी लागू होता है। जब एक साधक भक्ति करता है तो गुरु भी उसे उसकी मेहनत देता है। पर एक फर्क है स्वार्थ और परमार्थ का संसार के मालिकों की एक ही कोशिश रहती है काम ज्यादा से ज्यादा लिया जाए , और मेहनत कम से कम देनी पड़े। लेकिन गुरु के अलौकिक दरबार में ऐसा नहीं है । वह तो ठीक इसके विपरीत होता है। स्वार्थ लेश मात्र भी नहीं केवल और केवल परहित की भावना अथवा दयालुता इतनी की चुटकी भर प्रयास के बदले में ही सद्गुरु अपना कृपाओं का पूरा अंबार खोल देता है। अर्पित किए गए एक ही फूल के बदले में पूरे बगीचा ही उपहार में दे डालता है ।इतिहास के पन्नों में दर्ज अनेकों दृष्टांत इस बात को सिद्ध करते हैं, की जगतगुरु श्री कृष्ण की उंगली पर जब चोट लगती है तो कहते हैं कि द्रौपदी ने तत्क्षण अपनी कीमती साड़ी का पल्लू फाड़ कर उनकी उंगली पर बांध दिया । उस समय प्रभु ने कहा द्रौपदी में तुम्हारे इस कपड़े के एक_एक धागे का ऋणी हूं । उनका ऐसा कहना किसी औपचारिकता को निभाना नहीं था बल्कि भविष्य में द्रौपदी पर आने वाले संकट से उसकी रक्षा करने का दिव्य वचन था । यही ऋण था जिसे चुकाने के लिए भगवान द्रोपति के लिए उस समय साड़ी का अंबार लगा देते हैं।
इस दिव्य सत्ता का सदा से यही स्वभाव रहा है वह अपने भक्तों द्वारा दी गई छोटी सी भेंट को भी समय आने पर विशाल रूप में लौटाते हैं ।उनकी इस विशालता का अनुमान लगाना भी शायद संभव नहीं है। जिस प्रकार धरती का पानी जब भाप बनकर ऊपर उड़ता है तब बादल उस पानी को हजार गुनाह करके बरसाता है। इसी तरह गुरु शिष्य के एक एक भाव के बदले में अपनी दयालुता को अनंत गुना करके बरसाता है।
इसलिए सभी संत महापुरुष यही कहते हैं कि जब तक जीवन में सच्चा गुरु नहीं आता तब तक एक साधक का आंतरिक उत्थान नहीं हो सकता है । इसलिए मनुष्य जीवन के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए जीवन में एक पूर्ण सद्गुरु की आवश्यकता है जो आत्मा का परमात्मा के साथ मिलन करवा कर जीवन को सफल बनाते हैं। और एक मनुष्य यदि आंतरिक उत्थान के लिए  जीवन का वास्तविक तत्व यानी ब्रह्म ज्ञान प्राप्त करना चाहता है, तो एक सच्चे सतगुरु की शरण में जाना होगा। वह हमारा दिव्य नेत्र खोलकर हमें ब्रह्मधाम तक ले जा सकते हैं । जहां मुक्ति और आनंद का साम्राज्य है जो पूर्ण गुरु की कृपा से ही प्राप्त होता है। इसलिए ऐसा कहना अतिशयोक्ति नहीं होगा कि सद्गुरु संसार और शाश्वत के बीच सेतु का काम करते हैं , क्षणभंगुरता से स्थायित्व की ओर ले जाते हैं।
कार्यक्रम के दौरान स्वामी अशोकाननंद जी, स्वामी मेघानंद जी। स्वामी नरेश जी,स्वामी वरिंदर जी, ने गुरु महिमा में सुमधुर भजनों का गायन किया।
इस समागम में जालंधर ब्रांच की ओर से साध्वी पल्लवी भारती, साध्वी त्रिनयना भारती, साध्वी शशिप्रभा भारती,साध्वी कात्यायनी भारती, साध्वी वसुधा भारती, साध्वी रीता भारती,साध्वी रीना भारती, साध्वी सुखबीर भारती, साध्वी ममता भारती जी उपस्थित हुए।