जालंधर: गत वर्षों में हिन्दू राष्ट्र के शगुफे उस सब पर पलीता लगा दिया जिस के लिये हमारे बुजुर्गों ने शहादत और कुर्बानियां दी l यह मान लिया गया हिन्दू कोई धर्म है और वह बहुसंख्यक जबकि हिन्दू नाम का न कोई धर्म था / है बस एक कल्पना, यदि कोई अस्तित्व था तो वह वैदिक जिसमें यह बताया गया जन्मना जायते शुद्र वहीं से बताया गया वरण की उत्पत्ति l

देखते ही देखते अनेकों भ्रम भ्रांतियों का उफान उठा बौद्ध ने समाज के ताने बाने को संभालने का प्रयास किया , वैसे भी कबीलों से बस्तियां और बस्तियों से समाज की धारणा और फिर राज्य का विकास इसी बीच जैन और फिर योग पंथ आदि , इस्लाम एक और धारणा लेकर आया वह था बराबरी, हक और इकबाल, यह ऐसा विचार जिससे नए परिवेश में प्रदर्शित होना स्वाभाविक ही, सूफी संतो के इस विचार ने एक ऐसी क्रांति का उद्घोष किया क्योंकि भारत का मानस तब तक कयी हिस्सों में विभाजित होता चला गया l वरण व्यवस्था ने जातिवाद की खड़ा कर दिया, अनेकों तरह की पूजा पद्धति, आस्थाओं का अम्बार , समाजिक एकता त्राहि त्राहि , वहीं से इस खिते को हिन्दू की संज्ञा दे दी गयी l

फिर उठी आखिर सदा तौहीद की पंजाब से गुरू नानक ने एक नयी क्रांति का उद्घोष कर दिया जिससे हिन्दू और मुस्लिम के बीच कड़ी स्थापित हुई , आधार बना पाखण्ड, जातिवाद, शोषण , नशा और भय से मुक्त समाज की स्थापना जिसे सिख धर्म के तौर पर पहचान मिली , इसी दौरान ईसायी भी भारत भूमि पर उदय हुआ , उसका वैज्ञानिक दृष्टिकोण, आर्थिक प्रबंधन का नया माडल, सामाजिक व्यवस्था का नया आदर्श देखने को मिला परंतु उसी ने भारत को colonial mindset प्रदान किया , नतीजा समाज बंटता चला गया , धर्मों के टकराव को उछाल मिला, शोषण ने नए आयाम जिससे असमानता की सभी हदें पार होती चली गयी l राजशाही ने देश के मानस को जकड़ लिया, समृद्धि आर्थिक स्थिति कमजोर होती चली नतीजा आजादी का संघर्ष उभर गया , गांधी ने हिन्दू , मुस्लिम और सिख को साथ साथ लाने के प्रयास किये हालांकि अनेकों आजादी के संघर्ष के आयाम परंतु गांधी का प्रयास पूरे विश्व में एक सफल प्रयोग साबित हुआ , आजादी तो मिली परंतु वे सारे सुपने धीरे-धीरे बिखरते चले गये l संविधान तो बना पर उन आश्वसनों को दर किनार कर दिया , सिख और मुस्लिम पहले ही बंटवारे के संताप को झेल चुका था उसे और निराश होना पड़ा l

हुकम सिंह और भूपिन्द्र सिंह मान जो सिख प्रतिनिधि संविधान सभा में वे संविधान सभा से जब संविधान को देश ने धारण करना था वे वाक आउट कर गये कि उन आश्वसनों पर चर्चा तक नही हुई जो समय समय कांग्रेस, गांधी और नेहरू ने दिये बस यहीँ से हिन्दू जिसकी व्याख्या ही नहीं की गयी उसी को बहुसंख्यक के तौर पर स्थापित कर दिया l

हिन्दू केवल ब्राह्मणवाद की धारणा से उपजा शब्द जिसमें ब्राह्मण वैश्य राजपूत और ठाकुर अन्यथा हिन्दू कौन उधर सिख को हिन्दू में समाहित कर जले पर नमक डालने का कारण ही तो था l डा अम्बेडकर ने शोषित को दो हिस्सों में बंटवारा करवा दिया ताकि देश के हिन्दू के 22.50 % को विशेष आरक्षण का प्रावधान पर वह तभी यदि वह हिन्दू अर्थात उस Sc /St को आरक्षण के लालच नें उसी को क्ट्टर हिन्दू l

स्वाभाविक ही मुस्लिम चाहे 20 फीसद भी हो तब भी उसे अलग थलग कर दिया उसकी कोई अहमियत ही न बची उधर सिख चाहे 3 % ही परंतु वह कड़ी हिन्दू और मुस्लिम के बीच में वह भी टूटती चली गयी 1984 का सिख कत्लेआम और फिर बाबरी मस्जिद के नाम पर मुस्लिम और 2002 के गुजरात के मुस्लिम को 20 फीसदी होते हुए भी केवल वोट बन कर रह गया , आज सिख और मुस्लिम की स्थिती l

जब देश इस हालात से गुजर रहा है तो रास्ता क्या बचा ? यह यक्ष प्रशन ?

2025 के वर्ष में गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत का 350 वां वर्ष पूरा देश उस शहादत को समर्पित परंतु मुझे लगा भाजपा सरकारें इसे इस लिये नहीं की कि वे समर्पित हैं बल्कि इस लिये कि यह प्रचार किया जायेगा कि यह शहादत तिलक और जनेऊ और हिंदू रक्षा हेतु जिससे सिख और मुस्लिम में और दूरियाँ जबकि वह शहादत शोषित को हक और इन्साफ मिले क्योंकि मुगल सलतनत में चाहे बादशाहत मुगल थी परंतु प्रशासन पर काबिज हिन्दू ब्राह्मण सलाहकार , राजपूत सेनापति और वैश्य खजाना प्रबंधन और इन्ही को तिलक, जनेऊ धारण का अधिकार और मन्दिर संचालन भी इन्ही के पास, यदि फिर कोई कहे मन्दिर तोड़े गये तो यह काल्पनिक ही तो माना जायेगा l मुगल काल में मन्दिर के साथ मस्जिद बनी उसे हटा कर नहीं तो गुरुओं जिनके मुगल काल खास तौर पर बाबर से औरंगजेब उधर गुरू नानक से गुरू गोबिंद सिंह तक मित्रवत सम्बंध रहे कुछ उदाहरण हैं जहां खट्टे-मीठे होते हुए नज़र आते हैं परंतु वह भी उसी शाषित अर्थात जो हिन्दू प्रशासन पर काबिज़ उसी के कारण l

मैने इसी को समझते हुए सलमान खुर्शीद पूर्व विदेश मंत्री से बात की , वे सहर्ष सहमत होते हुए गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत के 350 वें वर्ष को समर्पित हक ए अमन सेमिनार के आयोजन को इंडिया इसलामिक केन्द्र दिल्ली में करने के लिए आगे बढ़ गये जिसे 24 अगस्त 2025 को किया गया, इसकी सफलता ने एक नये आयाम का राह खोल दिया उसके बाद जयपुर और अभी 4 जनवरी 2026 को पूना में आहुत किया गया जिसमें सिख, मुस्लिम , मराठा और जाट आदि की बढ़चढ़ कर हिस्सेदारी रही , इसने मुझे वह दिन याद करवा दिया जब गुरुग्राम में मस्जिदों में जुम्मे की नमाज़ के लिये जगह की कमी के कारण खुले में पार्कों में करनी पड़ती और हर बार बवाल मचता तो गुरदवारा परिसर में करने के लिये व्यवस्था बनाने का प्रयास फिर क्या था यह 19 नवम्बर 2022 को होनी थी पूरा बाजार इसके विरोध में हालांकि नमाज़ के लिये मुस्लिम ने ही इंकार यह कहते हुए कर दिया क्योंकि गुरू नानक का प्रकाश पर्व इस लिये कोई रुकावट न बने परंतु जो उसका असर देखने को मिला मेरी प्रेस से बातचीत 11 बजे थी परंतु माननीय प्रधान मंत्री महोदय ने तीनों खेती कानून वापिस यह कहते हुए ले लिये “शायद मेरे समझाने में कोई कमी रही होवे ” जबकि किसान 13 महीने दिल्ली के गलियारे में बैठे रहे गर्मी सर्दी बरसात आदि की परवाह न की , 700 – 800 किसान शहीद हो गये , उत्तर प्रदेश में किसानों पर कार चढ़ा दी गयी परंतु यह वही समय जब इस नमाज़ ने वह कर दिया किसी ने सोचा नही था , हुकम सिंह पूर्व लोक सभा अध्यक्ष ने एक बार कहा था ” भारत अगर सेकुलर है वह सिख और मुस्लिम के कारण , जब तक सिख और मुस्लिम इसका हिस्सा हैं तब तक इसकी धर्म निरपेक्षता पर आँच नहीं आ सकती ” l जो लोग समाजवाद की बात करते हैं उनको समझ लेना होगा यदि कोई समाजवाद का प्रहरी है वह सिख और मुस्लिम क्योंकि समाजवाद की पहली शर्त ही जाति उन्मूलन जबकि हिन्दू तभी यदि जातिवाद है बिना जाति के हिन्दू की धारणा सम्भव ही नहीं l

कुछेक से चर्चा करते हुए और इन तीन सेमिनारों के मद्देनजर 15 फरवरी 2026 को पंजाब प्रेस क्लब क्लाक टावर जलंधर पंजाब में सिख मुस्लिम मराठा जाट और अन्य जो भावी भारत कैसा हो उस पर चर्चा हो उसका आयोजन किया जाने का संकल्प है , जो भी इसमें शामिल होना चाहें वे अपनी सहमति प्रदान करें ताकि निमंत्रण भेजा जा सके l