
जालंधर: इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स देशभर के 50,000 से अधिक शिशु रोग विशेषज्ञों का एक राष्ट्रीय संगठन है, जो बच्चों के स्वास्थ्य की सुरक्षा तथा नैतिक चिकित्सकीय आचरण को सुदृढ़ बनाए रखने के लिए प्रतिबद्ध है।
चिकित्सा पेशा वर्तमान समय में बढ़ती विधिक जांच का सामना कर रहा है। चिकित्सकों और अस्पतालों के विरुद्ध आपराधिक शिकायतों तथा उपभोक्ता वादों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यद्यपि स्वास्थ्य सेवाओं में जवाबदेही आवश्यक है, किंतु जब किसी रोगी की स्थिति बिगड़ती है या मृत्यु हो जाती है, तब बिना पर्याप्त आधार के आपराधिक प्रकरण दर्ज कर देना चिकित्सा समुदाय में गंभीर चिंता और असुरक्षा की भावना उत्पन्न कर रहा है।
यह पुनः स्पष्ट करना आवश्यक है कि जैकब मैथ्यू बनाम पंजाब राज्य, मार्टिन एफ. डी’सूजा बनाम मोहम्मद इशफाक, ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार तथा कुसुम शर्मा बनाम बत्रा अस्पताल के निर्णयों द्वारा कथित चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में स्पष्ट और बाध्यकारी दिशा-निर्देश स्थापित किए गए हैं।
माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा स्थापित प्रमुख सिद्धांत
आपराधिक अभियोजन केवल गंभीर (घोर) चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में ही उचित है; मात्र निर्णय में त्रुटि या प्रतिकूल परिणाम के लिए नहीं।
कथित आपराधिक चिकित्सकीय लापरवाही के मामलों में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने से पूर्व प्रारंभिक जांच अनिवार्य है।
अभियोजन प्रारंभ करने से पहले स्वतंत्र चिकित्सकीय अभिमत आवश्यक है—अधिमानतः मुख्य चिकित्सा अधिकारी या समकक्ष प्राधिकारी की अध्यक्षता में गठित शासकीय चिकित्सा मंडल से।
चिकित्सकों की गिरफ्तारी सामान्य प्रक्रिया के रूप में नहीं की जानी चाहिए तथा तब तक टाली जानी चाहिए जब तक कि अभिरक्षा में पूछताछ अत्यंत आवश्यक न हो।
आपराधिक जांच आगे बढ़ाने से पूर्व उसी विशेषज्ञता के सक्षम चिकित्सक का विशेषज्ञ अभिमत आवश्यक है।
उपचार के दौरान दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु की स्थिति में—यदि आरोप उपयुक्त हों—तो उन्हें चिकित्सकीय लापरवाही तक ही सीमित रखा जाना चाहिए; स्पष्ट आपराधिक आशय या जानकारी के प्रमाण के बिना स्वतः गैर-इरादतन हत्या जैसे गंभीर आरोप नहीं लगाए जाने चाहिए।
भारत के संविधान के अनुच्छेद 141 के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय सभी न्यायालयों, पुलिस प्राधिकारियों तथा शासकीय विभागों पर बाध्यकारी हैं। इनका अनुपालन न करना न्यायालय की अवमानना की श्रेणी में आ सकता है। अतः यह आवश्यक है कि वरिष्ठ पुलिस अधिकारी समय-समय पर विभागीय परिपत्र जारी कर इन न्यायिक निर्देशों के अनुपालन को सुनिश्चित करें।
विधिसम्मत प्रक्रिया का पालन न करने के गंभीर परिणाम सामने आए हैं, जिनमें डॉ. अर्चना शर्मा का दुखद प्रकरण भी शामिल है, जिसने चिकित्सा समुदाय को गहराई से झकझोर दिया और प्रक्रियात्मक सुरक्षा तथा विधिक अधिकारों के प्रति जागरूकता की तत्काल आवश्यकता को उजागर किया।
आगे की राह
▪ विधि प्रवर्तन एजेंसियों के लिए: आपराधिक प्रकरण दर्ज करने अथवा गिरफ्तारी से पूर्व सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों का कड़ाई से पालन।
▪ चिकित्सा समुदाय के लिए: विधिक अधिकारों एवं अभिलेखन मानकों के प्रति जागरूकता; गंभीर उपचार स्थितियों में रोगी परिजनों के साथ सक्रिय, संवेदनशील एवं पारदर्शी संवाद।
▪ समाचार माध्यमों के लिए: उत्तरदायी समाचार प्रस्तुति, सनसनीखेजता से परहेज, योग्य चिकित्सकों और अप्रमाणित व्यक्तियों के बीच स्पष्ट अंतर, तथा नैतिक चिकित्सकों द्वारा प्रतिदिन दी जा रही सेवाओं को प्रमुखता देना।
स्वास्थ्य सेवा स्वभावतः जोखिमयुक्त है, विशेषकर आपातकालीन एवं गहन चिकित्सा परिस्थितियों में। प्रतिकूल परिणाम स्वतः लापरवाही का प्रमाण नहीं होता। चिकित्सकों को अन्यायपूर्ण अभियोजन से संरक्षण देना जवाबदेही से बचना नहीं है—यह निष्पक्षता, विधिसम्मत प्रक्रिया तथा जीवन-रक्षक पेशे के मनोबल की रक्षा का प्रश्न है।
संतुलित जवाबदेही और रोगियों तथा चिकित्सकों के बीच पारस्परिक विश्वास ही एक सुदृढ़ स्वास्थ्य व्यवस्था की आधारशिला हैं।
सादर,
डॉ. नीलम मोहन
राष्ट्रीय अध्यक्ष
डॉ. अनुराधा बंसल
अध्यक्ष, जालंधर एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स
डॉ. नूपुर सूद
सचिव
जालंधर एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स
डॉ. रुधिरा गुप्ता
महासचिव
इंडियन एकेडमी ऑफ पीडियाट्रिक्स