जालंधर: मुझे कल एक बैठक में शामिल होने का मौका मिला उससे पहले भी इसी मुद्दे पर एक चर्चा 25 मार्च 2026 को हुई , यह सही है देश बड़े ही संकट के दौर से गुजर रहा है , परंतु जितने भी आंदोलन इन दिनों किये गये उनका हस्र यही हुआ कि वे दमन का शिकार ही हो होकर रह् गये I वास्तव में गुरू नानक ने बताया ” वैदा वैद सो वैद तूँ , पहिलां रोग पहचान ” फिर ही उसकी दवा का बन्दोबस्त I

मेरे जहन में दो आंदोलनों को मैने देखा एक जे पी आंदोलन और फिर अन्ना आंदोलन , दोनों की पृष्ठ भूमि मे संघ ही खड़ा था , उन दोनों का जो हश्र हुआ वह सबके सामने इन दोनों के कारण पहले सिखों को हाशिय पर धकेल दिया गया और फिर मुस्लिम आज सिख और मुस्लिम राजनीतिक नीति निर्धारण प्रक्रिया से बाहर और सत्ता पुरी तरह संघ के हाथ में चली गयी जिसके बारे में मृणाल पांडे हिन्दोस्तान की सम्पादिका ने 2013 में ही चेता दिया था ” संघ को एक ऐसे व्यक्ति की ज़रूरत थी जो स्वछन्द होकर संघ के एजेंडा को लागू करे, उसके राज में कोई यह न कह सके वे धर्म के नाम पर वंदे मात्रम नहीं गायेगा ” 2014 से यही हुआ जब मोदी के हाथ में सत्ता संघ के हाथों I जब चानक्य उनका आदर्श जिसका लक्षय साम दाम दंड भेद हो उसी को तो मोदी ने अपनाया , उसके बारे में कोई कुछ भी कहे इतिहास की खिल्ली उड़ती देखी , अब कोई कुछ भी कहे , उन्हें अहसास है सत्ता को हाथ से नहीं निकलने देना चाहे कुछ भी करना पड़े I नोटबन्दी हुई देश जाये गर्क में गोलवालकर अनुसार दो तीन शाहुकार हों शेष उनके दान पर पलने वाले वही करके दिखा दिया , किसान आंदोलन का हश्र क्या हुआ 700 से अधिक किसान शहीद हो गये 13 महीने देहली की चौखट पर बैठे रहे , यदि पूर्व राज्यपाल मलिक ने जैसा बताया कि उन्होने मोदी से बात की तो जवाब था “क्या वे मेरे लिये मरे ?” कैसी विडम्बना ?

मुझे याद है गुरुग्राम में पार्कों में खुले में मुस्लिम जो रोजी रोटी के लिये काम करते थे जुम्मे की नमाज पर हुड़ दंग मचा दिया जाता था तो सिखों के मानस में आया यह क्या बात है उन्होने कहा आओ जब तक कोई सिस्टम नहीं बन जाता गुरदवारा के प्रांगण में ही आप लोग नमाज अदा कर लिया करें , 19 नवम्बर का दिन था गुरू नानक का पर्व उसी दिन यह होने का बिगुल बज गया नतीजा मोदी को यह कह कर खेती के तीनों कानून वापिस ले लिये गये ” मैं किसानों को समझा नही पाया वापिस लेता हूँ ” उसके बाद क्या हुआ वही आंदोलन जिसकी भूरि भूरि प्रशंसा की जाती है , वह लोग कहां हैं और कानून न होने के बाद भी उसका क्या हश्र परंतु यह बात साफ थी संघ ने हर सम्भव प्रयास किया कि सिख और मुस्लिम को मुख्य धारा से ही बाहर कर दिया जाये परंतु उस नमाज ने सिख और मुस्लिम को नजदीक ला खड़ा कर दिया शायद इस बात का अहसास नहीं कर पाये जबकि शाहीन बाग आंदोलन का क्या हश्र हुआ वह भी हम सबके सामने , मुझे तो उन पर तरस आता है जो खुद को विद्वान समझते थे वही अन्ना आंदोलन , फिर शाहीन आंदोलन और फिर किसान आंदोलन की हवा बनाये थे वे कहां हैं , क्या वे संघ को समझ नहीं पाये थे मुझे तो गांधी वादियों पर भी दया आती है जो अन्ना को दूसरा गांधी मान बैठे थे , कोई फ्टाका होता मुस्लिम को निशाना बना उन पर क्या कुछ नहीं हुआ , जो आंदोलन चला रहे थे किसी की जबां तक न खुली I

मुझे याद है मुझे कुछ मुस्लिम मिले और अपनी दास्तां को सुनाया तो मेरे मन में आया इसके बारे में समझना हो तो लोगों के बीच जाना पड़ेगा वेयीं नदी पंजाब से गांगा न्दी बनारस तक की य़ात्रा की उसकी समीक्षा 6.5.2011 को पत्र द्वार त्तकालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को अवगत करवाया उन्होने 3 जून 2011 को मुझे पत्र द्वारा उस की प्रशंसा तो की, पर शायद उस हालात में उस पर कार्यवाही न कर सके l मनमोहन सिंह के दौर को समझने का प्रयास करें तो पायेंगे कि जो सिख हो, उसके पास संख्याबल सांसदों का 145 ही हो 2004 में उसी मनमोहन सिंह ने संसद पटल पर 1984 की त्रासदी की सिखों से मांगी हो और सच्चर कमेटी के गठन से मुस्लिम को भी यह अहसास करवा दिया हो कि उनके आत्मसम्मान की रक्षा की जायेगी उसी का कारण 2009 में वही 145 से 206 हो गया , जैसे ही राहुल की चौकड़ी ने उसे ब्राहमन जनेऊ धारी शिव भक्त बना मन्दिर मन्दिर का मखौटा बनाया सिख और मुस्लिम फिर बाहर नतीजा 2014 में कांग्रेस 44 पर , 2019 में 52 पर जब फिर से राहुल को निजात मिली, जिस मुद्दे को लेकर हमने 2016 को आनन्दपुर साहिब से नफरत छोड़ो का अभियान से किया और फिर अप्रिल 2023 को पूना में इस पर सम्मेलन किया जिसमें पूर्व राजसभा सांसद मोहम्मद अदीब और गांधी शांति प्रतिष्ठान के अध्यक्ष भी शामिल हुए ,उसके बाद राहुल ने उसी मुद्दे को लेकर की और जनवरी 2024 में हमने आनन्द वर्धन , अजय शुक्ला और गांधी जनों ने मिलकर दिल्ली से जम्मु तक की य़ात्रा की नतीजा जो भाजपा 400 के आंकडे को छुने की बात कर रही थी 240 पर निपट गयी उस समय भी मैने कहा था पंजाब से कांग्रेस 7 सीट जीतेगी और दिल्ली की सातों हारेगी क्योंकि जिस घोड़े पर स्वारी करने लगी है उसका यही नतीजा होगा अन्यथा 32 सीट का नुक्सान कांग्रेस को हुआ , मै इस मुद्दे का अधिक कायल नहीं कि EVM से चुनाव जीते जाते हैं जबकि कांग्रेस को कोई हराता नहीं यह खुद ही हारने के लिये तत्पर l

अब जिस आंदोलन को खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है क्या वह कुछ कर पायेगा जब देश पूरी तरह हिन्दू और मुस्लिम में बंटा है गली गली में यही प्रचार किया जाता है मुस्लिम को तो राजनीतिक व्यवस्था से ही बाहर कर दिया वह केवल वोट है l चुनाव हिन्दू बनाम हिन्दू हो चुके है तो ऐसे हालात में कहीं जिस आंदोलन की बात आप लोग कर रहे हैं मैने उन वक्ताओं को सुना वही उसी संघ की गोद में न बैठ जाये जो हरकत केजरीवाल ने की जो आंदोलनकारी वे बाहर और सत्ता संघ के हाथों में चाहे केजरीवाल & co कुछ भी कहे यह उसी का तंत्र ही तो l नतीजा क्या होगा कहीं मुस्लिम उसी दलदल में ही न फंस जाये I

गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत का 350 वां वर्ष था मुझे अहसास था इस शहादत को हिन्दू रक्षा में झोंक दिया जायेगा वही हुआ भी शिरोमनी गुरदवारा प्रबंधक कमेटी से लेकर सिख संस्थाओं ने इसी इतिहास को दोहराया उधर 18 राज्यों में भाजपा सरकार अथवा भाजपा पोषित सरकार यह पूरी तरह इस शहादत का प्रचार करेगी नाम औरंगजेब का होगा मुस्लिम निशाने पर और सिखों में मुस्लिम के प्रति क्या संदेश वह समझा जा सकता है, मैने सलमान खूर्शीद पूर्व विदेश मंत्री एवं कांग्रेस नेता से इस वृतांत की चर्चा की, मै अभारी हूँ कि उन्होने इसे समझते हुए इस पर सम्मेलन करने के लिये आश्वसन दिया उनकी बात पूर्व राजसभा सांसद और IMCR के अध्यक्ष मोहम्मद अदीब से भी बात हुई क्योंकि उनके साथ मेरे अरसे से सम्बंध हैं तो पहला 24 अगस्त 2025 को दिल्ली में, फिर 4 अक्तुबर,2025 को जयपुर और उसके बाद 4 जनवरी 2026 को पूना में किये गये उसका संदेश अंतर राष्ट्रीय हुआ , मेरा कहना था गुरू नानक ने हिन्दू की दो धाराओं को समझा उच्च जातीय मुगल सलतनत के प्रशासन पर काबिज था उसी को तिलक और जनेऊ का अधिकार मन्दिर संचालन भी उसी के हाथ में , गुरू नानक दूसरी धारा जो शोषित था उसके साथ खड़े हो गये जिसकी संख्याबल 70 फीसद थी, मुस्लिम तो कभी भी 20 फीसद से उपर नहीं रहा उन्होने पांच बिन्दुओं पर काम किया ” पाखण्ड , जातिवाद , शोषण , नशा और भय से मुक्त ” समाज की स्थापना जिससे मुगल सलतनत से गुरुओं के मित्रवत सम्बंध रहे हालांकि जो शाषित हिन्दू वह कैसे ब्रदास्त कर पाता गुरू अरजन और गुरू तेग बहादर की शहादतें इसी का नतीजा बल्कि गुरू गो बिन्द सिंह ने जब महसूस किया व्यक्ति गुरू से पूरे समाज को नहीं बांधा जा सकता इसलिये उन्हीं पांच बिन्दुओं पर आधारित पंचायत का गठन और पंचायती राज की स्थापना का मार्ग प्रदर्शित किया बस फिर क्या था वही शाषित वर्ग गुरू गो बिन्द सिंह के विरोध में , मुझे अहसास है जैसे ही औरंगजेब को इस हालात का पता चला ,वह बताया जाता है 10 दिनों में ही फौत को गले लगा गया I वास्तव में सिख इतिहास को हिन्दू के इतिहास में ही रलगढ़ कर दिया , यही है विडम्बना ? परंतु इस प्रयास ने सिख और मुस्लिम में ञ्जदीकियां पैदा कर दी , अब आंदोलन यह होना चाहिये कि नफरत के माहौल जो मुस्लिम के खिलाफ बना है उससे निजात कैसे मिले , चर्चा उस पर हो , कोई रास्ता तय हो परंतु वक्ताओं के विचारों को देखते हुए लगा कि रायता ही बिखेर दिया हो I

ऐसे माहौल में क्यों न जलियांवाला बाग की त्रासदी जो 13 अप्रिल 1919 को हुई जिससे आजादी का संघर्ष गांधी जो 1917 में चम्पारण से निकले वे जानते थे हिन्दोस्तान धार्मिक देश है धर्म मुखी ही वृतांत सिरजना होगा इसीलिये वे खिलाफत के साथ जिस कारण मुस्लिम साथ आ गये उसके बाद बाबा खड़क सिंह भी नतीजा एक ऐसा अन्दोलन खड़ा हो गया , मेरा कहना है क्यों न इस के संदर्भ में 10 अपरेल 2026 को जलियांवाला बाग जिस दिन डा. किचलू को बन्दी बनाया क्योंकि यह बैठक रोल्ट कानून के खिलाफ, जिस प्रकार हाल के वर्षों में जब देश आजाद उस समय कभी TADA , कभी POTA और अब UAPA से निजात मिले , से इस अभियान “नफरत छोड़ पैगाम ए हक ” की शुरुआत हो I क्योंकि देश ऐसे हालात से जूझ रहा अमृतसर की बजाये दिल्ली में ही एक विशेष सम्मेलन का आयोजन किया जाये I

आओ मिलकर सोचें समझें फिर चलें , वअपेक्षा है आप शामिल होने की सहमति प्रदान करेंगे ताकि उचित स्थान पर इसका आयोजन हो I