दिल्ली: आज के दौर में स्मार्टफोन ने घर और दफ्तर के बीच की दीवार पूरी तरह गिरा दी है। शाम छह बजे के बाद भी काम का दिन खत्म होने का नाम नहीं लेता। देर रात आने वाले ईमेल, व्हाट्सएप मैसेज और बॉस के तथाकथित “जरूरी” कॉल अब रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं। लगातार जुड़े रहने के इस दबाव ने कर्मचारियों को कभी पूरी तरह फ्री नहीं होने दिया। इसी गंभीर समस्या को देखते हुए लोकसभा में ‘राइट टू डिस्कनेक्ट बिल, 2025’ नामक निजी विधेयक पेश किया गया है। यह विधेयक राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट) की सांसद सुप्रिया सुले ने शुक्रवार को सदन में प्रस्तुत किया।भारतीय वर्कफोर्स पिछले कुछ वर्षों में “हमेशा ऑनलाइन” रहने के भारी दबाव का शिकार रहा है। कोविड के बाद रिमोट वर्किंग, स्लैक-टीम्स जैसे डिजिटल टूल्स और कंपनियों की बढ़ती अपेक्षाओं ने काम और निजी जीवन की सीमाएं पूरी तरह मिटा दी हैं। नतीजा यह है कि कर्मचारी न तो ठीक से आराम कर पाते हैं और न ही परिवार के साथ क्वालिटी टाइम बिता पाते हैं। लगातार उपलब्ध रहने की यह मजबूरी तनाव, चिंता और बर्नआउट का बड़ा कारण बन रही है। राइट टू डिस्कनेक्ट बिल इसी असंतुलन को दूर करने की कोशिश करता है और कर्मचारियों को निर्धारित कामकाजी घंटों के बाद पूरी तरह डिस्कनेक्ट होने का कानूनी अधिकार देता है।