दिल्ली: भारतीय अर्थव्यवस्था और कर प्रणाली के इतिहास में 1 अप्रैल 2026 की तारीख एक क्रांतिकारी बदलाव के रूप में दर्ज होने जा रही है। केंद्र सरकार ने दशकों पुराने इनकम टैक्स एक्ट 1961 को पूरी तरह समाप्त कर एक नया, पारदर्शी और सरल आयकर कानून लागू करने का निर्णय लिया है। पुराने कानून की जटिलताओं, कठिन शब्दावलियों और कानूनी पेचीदगियों ने अक्सर आम करदाताओं को उलझाए रखा था, लेकिन अब सरकार का लक्ष्य एक ऐसी व्यवस्था देना है जो डिजिटल युग की ज़रूरतों के अनुरूप हो। यह नया कानून न केवल आपकी टैक्स फाइलिंग को आसान बनाएगा, बल्कि निवेश के तरीकों और सरकारी निगरानी के दायरे को भी परिभाषित करेगा। इस बदलाव का सीधा असर हर नौकरीपेशा, व्यापारी और निवेशक की आर्थिक स्थिति पर पड़ने वाला है।पुराने कानून में करदाताओं के लिए सबसे बड़ी चुनौती ‘प्रीवियस ईयर’ और ‘असेसमेंट ईयर’ के बीच के अंतर को समझना होता था। अक्सर लोग इस बात में भ्रमित हो जाते थे कि जिस साल कमाई हुई है, उसे किस श्रेणी में रखकर टैक्स भरें। इस ऐतिहासिक सुधार के तहत अब सरकार ने ‘टैक्स ईयर’ की एक एकल व्यवस्था पेश की है। इसका अर्थ यह है कि 1 अप्रैल से 31 मार्च के वित्तीय चक्र में आप जो भी आय अर्जित करेंगे, उसकी गणना और फाइलिंग उसी वर्ष के भीतर मानी जाएगी। इस कदम से टैक्स का गणित इतना सीधा हो जाएगा कि एक आम नागरिक को अपना रिटर्न भरने के लिए अब विशेषज्ञों या चार्टर्ड अकाउंटेंट पर अनिवार्य रूप से निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।नए कानून को लेकर आम जनता के बीच एक बड़ा सवाल यह था कि क्या उनकी निजी डिजिटल लाइफ अब टैक्स विभाग के रडार पर होगी। नए अधिनियम में स्पष्ट किया गया है कि कर चोरी रोकने के लिए अधिकारियों को डिजिटल साक्ष्य जुटाने की अतिरिक्त शक्तियां दी गई हैं लेकिन यह कोई सामान्य निगरानी प्रक्रिया नहीं है। यह नियम केवल उन विशिष्ट मामलों में लागू होगा जहां ‘गंभीर कर चोरी का ठोस संदेह हो। विभाग बिना किसी कानूनी वारंट या पुख्ता आधार के किसी भी नागरिक की व्हाट्सएप चैट या इंस्टाग्राम पोस्ट की जांच नहीं कर सकेगा। इसका मुख्य उद्देश्य उन लोगों को पकड़ना है जो अपनी विलासिता पूर्ण जीवनशैली सोशल मीडिया पर तो दिखाते हैं, लेकिन टैक्स रिटर्न में खुद को कम आय वाला बताते हैं। एक ईमानदार करदाता को इससे घबराने की कोई ज़रूरत नहीं है।मध्यम वर्ग और नौकरीपेशा लोगों के लिए नए कानून में एक बहुत ही मानवीय और राहत भरा बदलाव किया गया है। पुराने सख्त नियमों के तहत, यदि कोई व्यक्ति 31 जुलाई की समयसीमा तक अपना रिटर्न नहीं भर पाता था, तो वह अपने टीडीएस रिफंड का दावा करने का अधिकार खो देता था। नए कानून ने इस विसंगति को दूर कर दिया है। अब यदि आप निर्धारित तिथि के बाद यानी ‘बिलेटेड रिटर्न’ भरते हैं, तब भी आप अपना रिफंड वापस पा सकेंगे। हालांकि, रिटर्न दाखिल करने में अनुशासन बना रहे, इसके लिए मामूली जुर्माने का प्रावधान रखा गया है। 5 लाख रुपये तक की आय वालों के लिए 1,000 रुपये और उससे अधिक आय वालों के लिए 5,000 रुपये की लेट फीस तय की गई है। यह बदलाव सुनिश्चित करता है कि आपकी मेहनत की कमाई महज़ एक डेडलाइन चूकने की वजह से सरकारी खजाने में न रह जाए।