आज के समय में जब शिक्षा को अक्सर डिग्रियों, नौकरियों और वेतन से जोड़कर देखा जाता है, डी.ए.वी. यूनिवर्सिटी, जालंधर इस सोच को बदलने का प्रयास कर रही है। “भारतीय शिक्षा दर्शन और समग्र विकास” विषय पर आयोजित एक विशेष सत्र में विद्यार्थियों, अध्यापकों और शिक्षाविदों ने मिलकर शिक्षा के वास्तविक अर्थों पर विचार साझा किए।
इस सत्र के मुख्य वक्ता श्री देसराज शर्मा, अखिल भारतीय महामंत्री, विद्या भारती थे। उनका स्वागत करते हुए वाईस चांसलर डॉ. मनोज कुमार ने कहा कि यूनिवर्सिटी का उद्देश्य केवल कुशल पेशेवर तैयार करना नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक मूल्यों से युक्त जिम्मेदार नागरिक तैयार करना है।
श्री देसराज शर्मा ने अपने संबोधन में “पंच कोष” के सिद्धांत के माध्यम से शिक्षा की व्याख्या की। उन्होंने बताया कि शिक्षा केवल जानकारी देने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी प्रक्रिया है जो मनुष्य के पाँच आयामों: शरीर, प्राण, मन, बुद्धि और आत्मा का विकास करती है। इस प्रकार उन्होंने शिक्षा को एक समग्र और भारतीय परंपराओं से जुड़ी प्रक्रिया के रूप में प्रस्तुत किया।
उन्होंने राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 से इस दर्शन को जोड़ते हुए कहा कि यह नीति कौशल-आधारित, अनुभवात्मक और मूल्य-आधारित शिक्षा को बढ़ावा देती है। रटने की प्रवृत्ति से हटकर वास्तविक समझ और अनुभव की ओर बढ़ना शिक्षा के वास्तविक उद्देश्य को पुनः प्राप्त करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
सत्र के दौरान भाषा और पहचान के महत्व पर भी चर्चा की गई। उन्होंने मातृभाषा के महत्व पर जोर देते हुए कहा कि भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं है, बल्कि यह सोच का निर्माण करने के साथ -साथ, संस्कृति को संरक्षित करते हुए और व्यक्ति में आत्मविश्वास उत्पन्न करती है।
अंत में विद्यार्थियों ने वक्ता के साथ प्रश्न-उत्तर सत्र में भाग लिया, जिसमें उन्होंने जीवन के उद्देश्य, पहचान और शिक्षा के भविष्य पर अपने विचार साझा किए। इससे यह स्पष्ट हुआ कि युवा वर्ग अब सफलता को केवल पारंपरिक मानकों से नहीं जोड़ता।
विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ इंडियन नॉलेज सिस्टम की सदस्य डॉ. समृति खोलसा ने अंत में धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि यह सत्र हमें याद दिलाता है कि शिक्षा केवल आजीविका कमाने के लिए नहीं, बल्कि जीवन जीने की कला सीखने के लिए होती है।