

जालंधर: बचपन में ऑटिज़्म: शुरुआती संकेत, चुनौतियाँ और उपचार ऑटिज़्म या ऑटिज़्म स्पेक्ट्रम डिसऑर्डर (ASD) एक न्यूरो-डेवलपमेंटल स्थिति है, जिसमें बच्चे के बोलने, समझने, सामाजिक व्यवहार और सीखने के तरीके में अंतर दिखाई देता है। यह कोई बीमारी नहीं है जो छूने से फैलती हो, बल्कि बच्चे के मस्तिष्क के विकास से जुड़ी स्थिति है। सही समय पर पहचान और उचित सहायता मिलने से ऑटिज़्म वाले बच्चे बेहतर जीवन जी सकते हैं।
ऑटिज़्म के शुरुआती संकेत अक्सर 1 से 3 वर्ष की उम्र के बीच दिखाई देने लगते हैं। बच्चा अपना नाम सुनकर प्रतिक्रिया नहीं देता, आंखों में आंखें डालकर कम देखता है, दूसरों से कम घुलता-मिलता है, बोलने में देरी होती है या वह बार-बार एक ही शब्द दोहराता है। कुछ बच्चे खिलौनों को सामान्य तरीके से खेलने के बजाय लाइन में लगाते रहते हैं। कई बच्चों में हाथ फड़फड़ाना, बार-बार घूमना या एक ही काम को दोहराना भी देखा जाता है।
ऑटिज़्म वाले बच्चों को रोजमर्रा की जिंदगी में कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। उन्हें अपनी भावनाएं व्यक्त करने, दोस्त बनाने, स्कूल में पढ़ाई समझने और नए माहौल में ढलने में कठिनाई हो सकती है। कुछ बच्चों को तेज आवाज, भीड़, रोशनी या कुछ खास कपड़ों से परेशानी होती है। कई बार उनके व्यवहार को लोग गलत समझ लेते हैं और उन्हें “जिद्दी” या “असभ्य” कह देते हैं, जबकि वास्तव में उन्हें अतिरिक्त सहयोग और समझ की जरूरत होती है।
ऑटिज़्म का कोई एक निश्चित इलाज नहीं है, लेकिन समय पर थेरेपी और प्रशिक्षण से बच्चे में काफी सुधार लाया जा सकता है। स्पीच थेरेपी बच्चे को बोलने और संवाद करने में मदद करती है। बिहेवियर थेरेपी से सामाजिक व्यवहार और रोजमर्रा के काम सीखने में सहायता मिलती है।
ऑक्यूपेशनल थेरेपी ऑटिज़्म वाले बच्चों के लिए बहुत महत्वपूर्ण होती है। इसके माध्यम से बच्चे को खाना खाना, कपड़े पहनना, लिखना, खेलना और अपने शरीर के संतुलन को बेहतर तरीके से नियंत्रित करना सिखाया जाता है। जिन बच्चों को तेज आवाज, स्पर्श या रोशनी से परेशानी होती है, उन्हें ऑक्यूपेशनल थेरेपी से काफी लाभ मिलता है।
समावेशी शिक्षा यानी इनक्लूसिव एजुकेशन भी बहुत जरूरी है। ऑटिज़्म वाले बच्चों को सामान्य स्कूलों में पढ़ने का अवसर मिलना चाहिए, जहां शिक्षक उनकी जरूरतों को समझें और सहपाठी उन्हें स्वीकार करें। इससे बच्चे का आत्मविश्वास बढ़ता है और वह समाज का हिस्सा महसूस करता है।
यह भी याद रखना जरूरी है कि ऑटिज़्म वाले बच्चों में कई विशेष प्रतिभाएं हो सकती हैं। कुछ बच्चे संगीत, चित्रकला, गणित, कंप्यूटर, याददाश्त या पज़ल्स में बहुत अच्छे होते हैं। सही मार्गदर्शन मिलने पर वे अपनी प्रतिभा के दम पर बड़ी उपलब्धियां हासिल कर सकते हैं। इसलिए ऑटिज़्म को केवल समस्या के रूप में नहीं, बल्कि अलग तरह से सीखने और समझने की क्षमता के रूप में देखना चाहिए।वर्ल्ड ऑटिज़्म डे की थीम है “ऑटिज़्म और इंसानियत- हर ज़िंदगी की कीमत है”
जालंधर एकेडमी ऑफ़ पीडियाट्रिक्स की प्रेसिडेंट डॉ. अनुराधा बंसल और सेक्रेटरी डॉ. नूपुर सूद ने डॉ. अनुपमा सग्गर और डॉ. पंकज चावला के साथ जिमखाना लॉन में सोच ऑटिज़्म सोसाइटी की इनक्लूसिव आर्ट एग्ज़िबिशन देखी। इस मौके पर माननीय DC डॉ. हिमांशु अग्रवाल चीफ गेस्ट थे।