
जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में श्री शनि देव महाराज जी के निमित सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान समीर कपूर से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध मां बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन-यज्ञ के पावन अवसर पर प्रेरक प्रवक्ता नवजीत भारद्वाज ने माँ भक्तों को अपने प्रवचनों के माध्यम से मौन की महिमा के बारे समझाते हुए कहते है कि तीन परिस्थितियां जहां चुप रहना ही सबसे बड़ा धर्म है। सनातन परंपरा में मौन को साधना का सर्वोच्च आभूषण माना गया है। शास्त्रों में वाणी की शक्ति का विशेष वर्णन मिलता है। वाणी जीवन बना भी सकती है और बिगाड़ भी सकती है। जहां वाणी संयमित होती है, वहीं जीवन में शांति, सम्मान और सफलता का प्रवेश होता है।
नवजीत भारद्वाज जी प्रभु भक्तों को समझाते हैं कि तीन स्थितियां, जहां मौन धारण करना ही सच्चा आध्यात्मिक आचरण है। सबसे पहले क्रोध के समय मौन रहना क्योंकि क्रोध मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु माना गया है। जब गुस्सा चरम पर हो, उस समय बोले गए शब्द बाण से भी अधिक तीखे हो जाते हैं। एक क्षण का आवेश वर्षों के रिश्ते तोड़ सकता है। ऐसे समय मौन धारण करना कमजोरी नहीं, बल्कि आध्यात्मिक परिपक्वता का प्रमाण है। मौन हमें समय देता है—सोचने का, समझने का और सही निर्णय लेने का।
नवजीत भारद्वाज जी ने मौन की महिमा की दूसरी परिस्थिति के बारे में प्रभु भक्तों को बताते है कि जब कोई आपकी बुराई कर रहा हो तो कर्म पर विश्वास रखें। जीवन में ऐसे लोग मिलते हैं जो आलोचना या निंदा करते हैं। उनको हर बात का उत्तर देना आवश्यक नहीं होता। सत्य को प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। वह स्वयं प्रकाशमान होता है।
इसी संदर्भ में उन्होंने गौतम बुद्ध का प्रसिद्ध प्रसंग सुनाया। जब किसी व्यक्ति ने बुद्ध को अपशब्द कहे, तो वे शांत रहे। बाद में उन्होंने कहा—यदि कोई उपहार दे और दूसरा उसे स्वीकार न करे, तो वह उपहार देने वाले के पास ही रहता है। इसी प्रकार निंदा भी उसी के पास रहती है जो उसे देता है। मौन हमारी गरिमा और आत्मसम्मान की रक्षा करता है; समय और कर्म ही सबसे प्रभावी उत्तर बनते हैं।
नवजीत भारद्वाज जी ने तीसरी स्थिति बताते हुए कहा कि जहां समझ की जगह अहंकार बैठा हो, वहां तर्क और ज्ञान व्यर्थ हो जाते हैं। ऐसे में शब्द केवल विवाद को जन्म देते हैं। उन्होंने महाभारत का उदाहरण देते हुए कहा कि दुर्योधन को बार-बार समझाने के बावजूद उसने सत्य को स्वीकार नहीं किया। अंतत: स्वयं श्रीकृष्ण ने भी समय को निर्णय करने दिया। जहां सुनने की इच्छा ही न हो, वहां मौन ही सबसे सशक्त उत्तर होता है।
नवजीत भरद्वाज जी ने प्रवचनों के अंत में कहा कि मौन ही मन की साधना है। मौन भागना नहीं है, मौन दबना नहीं है—मौन भीतर की शक्ति को पहचानना है। जहां वाणी नियंत्रित है, वहां जीवन संतुलित है।
इस अवसर पर रोहित भाटिया,सरोज बाला, विक्की अग्रवाल, अमरेंद्र कुमार शर्मा, प्रदीप , दिनेश सेठ,सौरभ भाटिया,विवेक अग्रवाल, ऋषभ कालिया,अजीत कुमार , नरेंद्र ,रोहित भाटिया,बावा जोशी,राकेश शर्मा,नवीन , प्रदीप, सुधीर,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,लक्की, मोहित , विशाल , अश्विनी शर्मा , रवि भल्ला, भोला शर्मा, जगदीश, नवीन कुमार, निर्मल,अनिल,सागर,दीपक,प्रिंस कुमार, पप्पू ठाकुर, दीपक कुमार, नरेंद्र, सौरभ,दीपक कुमार, नरेश,दिक्षित, अनिल अजय सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ उपरांत ल॔गर भंडारे का आयोजन किया गया।