
जालंधर: हिन्दोस्तान पर अंग्रेज हुकुमत कायम हो चुकी थी, सरकार ए खालसा से उसने पंजाब को छीन लिया था , बस वहीं से क्रांति का उदय हुआ
अनेकों लहरों ने जन्म लिया , खास तौर पर पंजाब से सिंह सभा लहर , उसके बाद बबर अकाली , सिख लीग , गदरी लहर , अंग्रेज हकुमत ने उन्हें दबाने के लिये शिकंजा कसने के लिये क्यी प्रकार के कानून प्रथम विश्व युद्ध पश्चात रोल्ट एक्ट जिससे आमजन की आवाज पर ही ताला लगा दिया l गांधी जैसे ही चंपारण से किसानों के हालातों से वाकिफ होकर निकले रोल्ट एक्ट लागू कर दिया , उसी के खिलाफ असहयोग आंदोलन की शुरुआत की l पंजाब में इसी के मद्देनजर 13 अप्रैल 1919 को विशेष बैठक का आयोजन जलियांवाला बाग में सैफुद्दीन किचलू , डा . सत्य पाल , मंगल सिंह ने करने का निश्चय किया , अंग्रेज हकुमत ने इसे बर्दास्त न करते हुए 10 अप्रैल 1919 को किचलू और सत्य पाल को ग्रिफतार कर लिया गया l
12 अप्रैल 1919 वैसाखी दिवस दरबार साहिब अमृतसर में मनाया जाना था, बहुत से दर्शनार्थी वहां पहुंचने लगे, स्वाभाविक ही वे सभी उस बैठक का हिस्सा बन गये , अंग्रेज हकुमत ने पूरे जलियांवाला बाग को घेर लिया और निहत्थे बच्चे स्त्री और आमजन शिकार हो गये उन पर गोलियां चला दी 300 से अधिक हत्याएं और 2000 से उपर लोग ज़ख्मी हो गये
उसकी पूरे देश में निन्दा हुई, अफसोस उस समय इतिहासिक गुरुद्वारों का प्रबंधन अंग्रेजी हकुमत द्वारा निहित सर्बराह के हाथों में था अकाल तख्त जो सिखों के लिये मीरी और पीरी का तख्त गुरू हरगोविंद साहिब के समय स्थापित किया गया वहीं से उसी जनरल ऐडवायर को अरूर सिंह ने सम्मानित कर दिया जो जलियांवाला बाग की त्रासदी का जिम्मेदार , उससे सिखों में रोष की लहर दौड़ गयी जिससे गुरुद्वारा सुधार लहर से गुरुद्वारों को आजाद करवाने का आन्दोलन जिसके लिये सिख लीग की कांफ्रेंस आहुत की गयी ज़िसमें गांधी मोती लाल नेहरू, मुहम्मद अली जोहर और शौक़त अली शामिल हुए l मुहम्मद अली जोहर ने उस को संबोधित करते हुए कहा “खालसा जी , हमारे बुजुर्गों ने हाकिम रहते आप पर ज्यादतियां की , उसकी माफी मांगता हूँ , मैं अपनी और अपने भायी शौक़त की गरदन पेश करता हूँ , आपका मन करे तो काट लें परंतु आज जरुरत है हम सबको एक होने की तभी अंग्रेज हकुमत से निजात पा सकते हैं “, यह था जलियांवाला बाग की त्रासदी का नतीजा
गुरुद्वारा सुधार से शिरोमणि गुरूद्वारा प्रबंधक कमेटी का कानून बना जिससे गुरुद्वारों का प्रबंधन सिखों का, सिखों द्वारा और सिखों के लिये स्थापना हुई जिसे गांधी ने देश की आजादी का प्रथम कदम बताया
आजादी तो हम सबने मिलकर हासिल की परंतु आजादी के बाद सिख और मुस्लिम के साथ जो वायदे किये गये;
” Congress assures the sikhs that no solution in any future Constitution will be acceptable to the Congress that does not give them full satisfaction” पर क्या हुआ
उसका उल्लेख तक संविधान सभा में किया नतीजा हुक्म सिंह और भूपिन्द्र सिंह मान ने संविधान सभा से वाक आउट ही नहीं कर गये बल्कि संविधान पर दस्तखत करने से भी इंकार यह कहते हुए कर दिया कि इस संविधान को सिख न मन्जूर करता है दिन था 26.11.1949 का उनकी आशंका सच साबित हुई गत 76 वर्षों से कभी TADA , POTA और अब UAPA के शिकार सिख और मुस्लिम ही हुए
आज जब उस 13 अप्रैल 1919 को 13 अप्रैल 2026 को देखते और आंकलन करते है सिख और मुस्लिम ही इसका भुक्त भोगी , उनको राजनीति नीति निर्माण से ही बाहर कर दिये , वे केवल वोट , उस वोट पर भी जैसा खबरों से आभास होता है उनको वोट से ही बाहर कर दिया , चिंता इस बात की कि कहीं उनको अपने भारतीय होने पर ही सवाल न खड़ा कर दिया जाए
आज जरूरत है फिर से उसी 13 अप्रैल 1919 को य़ाद करने की ताकि देश ज़िस हालात से गुजर रहा है वह अत्यंत चिंता जनक , मिलकर ही उससे निजात पायी जा सकती है, आज जब देश को हिन्दू और हिन्दुत्व के अखाड़े में खड़ा कर दिया , कोई यही नहीं बता रहा हिन्दू कौन है , अनुच्छेद 25 में हिन्दू को बताया गया “हिन्दू में सिख, बौद्ध और जैन शामिल हैं ” जबकि इन तीनों का अस्तित्व ही जिसे हिन्दू बताया जा रहा है उसके विरोध में l इस प्रकार के हालात से भी पिंड छुड़ाना पड़ेगा तभी देश विकास की ओर
IMCR , All India Peace Mission और केंद्रीय सिंह सभा ने प्रयास किया जब गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत के 350 वें वर्ष को समर्पित दिल्ली के India Islamic Cultural Centre में 24 अगस्त 2025, फिर 4 अक्तुबर 2025 को जयपुर उपरांत 4 जनवरी 2026 को पुणे में संगोष्ठी आहुत की गयी जिसका अंतरराष्ट्रीय प्रभाव पड़ा