
दिल्ली: भारत में तेजी से बढ़ रहा क्विक कॉमर्स सेक्टर इन दिनों गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। नए साल की पूर्व संध्या पर अचानक हुई राष्ट्रव्यापी हड़ताल में 2 लाख से अधिक गिग वर्कर्स ने भोजन, किराना और अन्य आवश्यक वस्तुओं की डिलीवरी करने से इनकार कर दिया। इस हड़ताल ने न सिर्फ प्लेटफॉर्म्स के ऑपरेशंस को झटका दिया, बल्कि 10 मिनट डिलीवरी जैसे आक्रामक बिजनेस मॉडल की सामाजिक और आर्थिक कीमत पर भी सवाल खड़े कर दिए।हड़ताल का नेतृत्व करने वाले संगठनों का कहना है कि सिर्फ वेतन या बीमा जैसे मुद्दों से समस्या का समाधान नहीं होगा। उनकी प्रमुख मांग है कि 10 मिनट डिलीवरी के दबाव को पूरी तरह खत्म किया जाए। उनका तर्क है कि अल्ट्रा-फास्ट डिलीवरी गिग वर्कर्स को जोखिम भरी ड्राइविंग के लिए मजबूर करती है, जिससे सड़क हादसों और स्वास्थ्य जोखिमों की आशंका बढ़ जाती है।ब्लूमबर्ग की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में आधे घंटे से कम समय में डिलीवरी की आदत कोविड-19 लॉकडाउन के दौरान विकसित हुई, खासकर रोजमर्रा के इस्तेमाल की वस्तुओं के लिए। अमेरिका में फ्रिज नो मोर, बायक, जोकर और गेटिर जैसी क्विक कॉमर्स कंपनियां मांग घटने के बाद बंद हो गईं, लेकिन भारत में यह सेक्टर और आक्रामक होता गया। यहां कंपनियों ने डिलीवरी समय घटाने के साथ-साथ प्रोडक्ट कैटेगरी को भी तेजी से बढ़ाया किराने से लेकर दवाइयों और घरेलू सामान तक।ब्लिंकइट, स्विगी इंस्टामार्ट और जेप्टो जैसे प्लेटफॉर्म्स ने तथाकथित “डार्क स्टोर्स” में भारी निवेश किया है। ये छोटे, रणनीतिक रूप से स्थित गोदाम होते हैं, जो तेजी से ऑर्डर पूरा करने में मदद करते हैं। रियल एस्टेट कंसल्टेंट सैविल्स पीएलसी का अनुमान है कि 2030 तक भारत में डार्क स्टोर्स की संख्या 2,500 से बढ़कर 7,500 हो सकती है। छोटे शहरों में भी 10 मिनट डिलीवरी की मांग तेजी से बढ़ रही है। मुकेश अंबानी के नेतृत्व वाले पारंपरिक रिटेल प्लेयर्स के साथ-साथ अमेजन और वॉलमार्ट के स्वामित्व वाली फ्लिपकार्ट भी अब इस सेक्टर में आक्रामक निवेश कर रही हैं।