
जालंधर: जालधंऱ में दो मार्च को पुरातन सोमानाथ ज्योतिर्लिंग पहुंच रहे हैं। आर्ट आफ लिविंग और गुरुप्रीत फाउंडेशन ओर से करवाए जा रहे इस भव्य आयोजन में शहर भर की संस्थाएं, मंदिर कमेटियां, हिस्सा ले रही हैं। दो मार्च को साईं दास स्कूल ग्राउंड में सुबह आठ से रात आठ बजे तक लोग ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर सकेंगे। सुबह आठ से दस और शाम को छह से आठ बजे तक रुद्र पूजा होगी। हमारा संकल्प है कि शहर वासी ज्योतिर्लिंग को 11 करोड़ बार ओउम नमः शिवाय लिखकर समर्पित करेंगे। इसके लिए संस्था की ओर से लोगों को कापियां बांटी गई हैं। जिसमें लोग ओउम नमः शिवाय लिख रहे हैं। सभी दो तारीख को अपनी अपनी कापी भगवान शिव को अर्पित करेंगे। दर्शन करने के लिए आन लाईन टोकन मिलेगा। दिए गए समय पर लोग दर्शन कर सकेंगे।
ऐसे हासिल करें फ्री दर्शन पर्ची
खबरिस्तान नेटवर्क। जालंधर के साईँ दास स्कूल मैदान में सोमवार दो मार्च को पुरातन सोमानाथ ज्योतिर्लिंग पहुंच रहे हैं। ज्योतिर्लिंग के दर्शन के लिए आनलाइन पर्ची हासिल करनी होगी, जिसके बाद आपको दर्शन का समय आपके व्हाट्सएप पर मिल जाएगा। वो व्हाट्सएप मैसेज दिखाकर आप दर्शन कर सकेंगे। इसका कोई शुल्क नहीं है। इसके लिए आपको नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करके रजिस्ट्रेशन करनी होगी।
🔹️नीचे लिंक पर क्लिक करें
https://gurupreetfoundation.com/
लिंक पर क्लिक करने के बाद दर्शन पर्ची की आप्शन आएगी, जिस पर क्लिक करने के बाद आपको नाम, ईमेल एड्रेस, फोन नंबर और कितने लोग दर्शन करना चाहते हैं ये भर के रजिस्टर करना होगा। इसके बाद आपको दर्शन पर्ची मिल जाएगी।
ज्योतिर्लिंग का इतिहास
हजारों सालों से, गुजरात स्थित सोमनाथ मंदिर को भारत का पहला ज्योतिर्लिंग होने का गौरव प्राप्त है। पुरातन कथाओँ में इस बात का जिक्र मिलता है कि है इस शिवलिंग की स्थापना चंद्रदेव ने की थी। एक हजार साल से भी अधिक समय पहले, इसे विश्व का सबसे भव्य, दिव्य और समृद्ध मंदिर माना जाता था। ऐतिहासिक प्रमाण है कि यहां का शिवलिंग हवा में तैरता था। इतिहास के पन्नों में दर्ज है कि चुंबकीय गुणों वाले एक दुर्लभ पत्थर से बने इस शिवलिंग को 1026 में महमूद गजनी ने तोड़ दिया था। मंदिर को 17 बार लूटा और ध्वस्त किया गया था।
महमूद गजनी ने जब तैरते हुए शिवलिंग को नष्ट किया तो उसके कुछ अवशेषों को तत्कालीन अग्निहोत्री पंडितों ने इकट्ठा किया और फिर दक्षिण भारत आ गए। सदियों से सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के टूटे हुए अवशेषों की रक्षा अग्निहोत्री ब्राह्मणों द्वारा की जाती रही, जो गुप्त रूप से इनकी पूजा और संरक्षण करते थे। इस भक्ति परंपरा में एक महत्वपूर्ण व्यक्ति अग्निहोत्री पंडित सीताराम शास्त्री हैं, जिन्होंने पिछले साल ज्योतिर्लिंग के इन टुकड़ों को गुरु श्री श्री रवि शंकर जी को सौंप दिया। शास्त्री, जो पिछले 21 वर्षों से स्वयं इनका संरक्षण कर रहे थे, उन्हें ये ज्योतिर्लिंग अपने चाचा से विरासत में मिले थे, जिन्होंने 60 वर्षों तक इनकी पूजा की थी। उनके चाचा को ये टुकड़े उनके गुरु प्रवेंद्र सरस्वती जी से प्राप्त हुए थे। उस समय के अग्निहोत्रियों ने 1924 में कांची परमचार्य चंद्रशेखर सरस्वती महास्वामी जी से संपर्क किया और उन्हें ज्योतिर्लिंग के बारे बताया। महास्वामी जी ने ज्योतिर्लिंग को अगले 100 वर्षों तक संरक्षित रखने और अयोध्या राम मंदिर की पुनर्स्थापना के बाद इसे गुरु श्री श्री रविशंकर जी को सौंपने के लिए कहा। पिछले साल जनवरी महीने में शास्त्री परिवार ने कुंभ से पहले ज्योतिर्लिंग गुरु श्री श्री रवि शंकर जी को सौंप दिए थे।
टेस्ट रिपोर्ट
ज्योतिर्लिंग के पत्थर का अध्ययन करने वाले वैज्ञानिकों के अनुसार, चुंबकीय गुण होने के लिए इसमें लौह तत्व का होना आवश्यक है। लेकिन यह विज्ञान का चमत्कार है कि केवल 2% लौह तत्व होने के बावजूद इसमें चुंबकीय गुण मौजूद हैं। ऐतिहासिक रूप से प्रसिद्ध ज्योतिर्लिंग के ऐसे दिव्य दर्शन यात्रा का आयोजन पूरे भारत में किया जाता है।
भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने शिवलिंग के दो नमूनों की जांच की और उनकी रिपोर्ट में एक नमूने में लगभग 140 गॉस और दूसरे में 120 गॉस का मजबूत चुंबकीय क्षेत्र दर्ज किया गया। तत्वीय विश्लेषण से बेरियम (78%), सिलिकॉन, मैग्नीशियम, सल्फर और आयरन की उपस्थिति का पता चला, जबकि एक्स-रे विवर्तन परीक्षणों ने पुष्टि की कि इसकी क्रिस्टलीय संरचना किसी भी धरती पर उपलब्ध खनिज से मेल नहीं खाती, जो इसकी विशिष्टता को सिद्ध करती है। मद्रास रत्न संस्थान की रिपोर्ट में इसके चुंबकीय गुणों की भी पुष्टि की है