जालंधर: अब चुनाव पंजाब का
केन्द्रीय सिंह सभा चंडीगढ़ में पंजाब बचाओ अभियान पर एक संगोष्ठी का आगाज़ किया गया , संगोष्ठी का आयोजन क्योंकि केन्द्रीय सिंह सभा द्वारा किया गया कोई किसी राजनीतिक दल का आवाहन नहीं था परंतु भाजपा और aap को छोड़ कर सभी राजनीतिक दल शामिल हुए l

मुझे समझने का मौका मिला कि पंजाब की राजनीति किस ओर करवट लेगी , पंजाब क्योंकि संघर्ष से गुजरा है , अब क्योंकि केन्द्र में संघ प्रायोजित सरकार है , लगभग 22 राज्यों में या तो भाजपा की सरकारें हैं अथवा उसके सहयोग से , अकाली दल अधिकतर भाजपा के सहयोग से सत्ता में रहा परंतु फरवरी 2024 में उसने अपना रास्ता बदला , जैसे ही हिमाकत की उसे टूटने के कगार पर खड़ा कर दिया गया , आज उसका हशर् यही l

अकाली दल ही था जिसने आजादी के संघर्ष को आत्मसात ही नहीं किया सबसे आगे की पंक्ती पर , यदि कांग्रेस और गांधी के साथ कोई खड़ा था वही अकाली दल, यही कारण था गांधी, नेहरू और कांग्रेस ने समय समय पर सिखों को आश्वस्त किया कि कांग्रेस उनके हितों उनके आत्म सम्मान उनके हक और हकूक के लिये प्रतिबद्ध, सिखों ने अपने हितों को शायद इसीलिए कुर्बान कर दिया और आजादी उपरांत कांग्रेस पर ही छोड़ दिया l उसे तब अह्सास हुआ जब संविधान सभा में संविधान में उन सब आश्वासनों की अनदेखी कर दी गयी, उन्हें शायद यह भरोसा था गांधी पर जो सत्य और अहिंसा को समर्पित परंतु उसी गांधी की हत्या आजादी के 6 मास के बाद ही करदी शायद वे ताकतें नहीं चाहती थी कि भारत धर्म निरपेक्ष हो और सिखों को दिये वायदों को पूरा किया जाने का गांधी दबाव बनाएँ l उनके मानस में हिन्दू राष्ट्र का भूत स्वार जबकि सिख उस विचार के खिलाफ थे , गुरुओं ने सभ को मीत हम आपन कीना का सबक पढ़ाया था , भय काहुं को देत नहि , नहि भय मानत आनि की गुढती पिलाई थी l

जैसा समय बीता संविधान मुक्कमल हुआ 26.11.1949 को उसको धारण करने की प्रक्रिया बस उसी दिन सिख प्रतिनिधि हुक्म सिंह और भूपिन्द्र सिंह मान संविधान सभा से वाक आउट कर गये और संविधान पर दस्तखत करने से इंकार ही नहीं इसे रिजेक्ट कर दिया यह कहते हुए जो आश्वासन आजादी के संघर्ष के दौरान किये उनका ज़िक्र तक नहीं किया गया और सिखों की पूरी तरह अन्देखी कर दी गयी तो यह संविधान सिखों को कैसे न्याय दे सकेगा यह यक्ष प्रशन ?

आजादी से विभाजन ने पंजाब और बंगाल को बांटा अर्थात सिख और मुस्लिम ही बंटे उस हालात में सिख और मुस्लिम ही उस विभाजन का शिकार बन गये तो उनके लिये केवल जीवन यापन की समस्या मूँह बाय खड़ी थी , सबकुछ भूल कर इसी में लग गये l अकाली नेता मास्टर तारा सिंह को अल्मोड़ा जेल में बन्द कर दिया तो कौन आवाज उठाता , यह सवाल खड़ा हो गया l करे तो क्या करे अब जो उस नेतृत्व पर सवाल खड़े करते हैं केवल उनको उन हालातों को व्यवहारिकता में समझने का प्रयास करना चाहिये ” मछली जाल न जानिया , सर खारा असगाह l अति सियानी सोहणी क्यों कीता विसाह ll ” सवाल मेरा उन पंजाबियत के अलम्बर्दारों से है वे उस समय कहाँ खड़े थे , मुख्य मंत्री भी वही थे कोई सिख नहीं था , वे बतायें वे पंजाब और उन आश्वासनों के बारे में क्या सोच रहे थे, क्यों वे केवल अकाली दल के खिलाफ खड़े हो गये, किसने ऐसे समय सिखों की धार्मिक भावनाओं को आहत किया तब वे कहाँ खड़े थे , भाषा के आधार पर प्रांतों का पुनर्गठन उस समय वे किसके साथ खड़े थे , किसको पंजाब के लिये संघर्ष करना पड़ा और हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तानी का नारा कौन लगा रहा था ,यह तो उनको बताना चाहिए l क्या पंजाब की जिम्मेदारी केवल सिखों की थी ? यदि हरियाणा का प्रस्ताव प्रस्तुत प्रो. शेर सिंह ने न किया होता तो क्या पंजाब का पुनर्गठन हुआ होता ? यदि पंजाब के संसाधनों के सवाल उठे तो क्या केवल पंजाब सिख ही था वे पंजाबियत वाले कहाँ खड़े थे , क्या उनको यह अहसास नहीं था पंजाब ज़िन्दा गुरां दे नाम ते ? नतीजा देश ने भुगता l

आज जो सभी दल दुहाई दे रहे हैं यदि यह उसी समय समझ लिया होता तो पंजाब सबसे समृद्ध होता परंतु संघर्ष सिख बनाम हिन्दू हो गया l आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को खालिस्तानी कौन बता रहा था ? इंदिरा गांधी तो इसके लिये भी तय्यार थी कि पंजाब में सिख नेतृत्व खड़ा हो जाए तब भी अकाली दल जे पी आंदोलन में कूद गया क्या मिला सिख निरंकारी विवाद नतीजा नीला तारा आप्रेशन और 1984 का सिख कत्लेआम तब पंजाबियत कहाँ खड़ी थी, किसी मुस्लिम ने तो सिखों पर ऐसा नहीं किया , अडवाणी की किताब में तो यह स्व स्वीकार्यता है कि यह उन्हीं के कारण अन्यथा इंदिरा गांधी तो अंतिम क्षण तक कर इसके लिये तय्यार नहीं थी तो तब पंजाबियत कहाँ खड़ी थी ?

यह शुक्र है सिखों के संघर्ष ने उन्हें शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी जैसी संस्था दी जो सिखों की , सिखों द्वारा और सिखों के लिये फिर भी जब भी कोई आपदा देश पर आयी यही है जो उसके लिये सर्वस्व न्यौछावर करने के लिये खड़ी हो गयी, यह है गुरु नानक गुरु गोबिन्द सिंह का संदेश , यह है खालसा संकल्प जिससे पंचायती राज की स्थापना हुई l

मैं बहुत तो नहीं कहना चाहता पंजाब गुरूओं की धरती है , सबको साथ लेकर चलने का अहसास करवाती है , क्यों न पंजाब के लिये कोई ऐसी व्यवस्था का आवाहन किया जाए ” सिख चिंतन बचेगा – पंजाब बचेगा, पंजाब बचेगा – देश बचेगा ” आगामी चुनाव को आपसी कड़वाहट को खत्म कर आपसी भायी चारे की बुनियाद की शुरुआत करें क्योंकि आज इसकी जरुरत भी जो विश्व पटल पर हालात बनते जा रहे हैं तो हम सबको संकल्प लेना होगा , पंजाब को नफरत का अखाड़ा न बनने दें , चुनाव में कोई जीतेगा कोई हारेगा , इसे इस तरह नहीं बल्कि यह हार जीत नहीं पंजाब , पंजाबियत और आपसी सद्भाव का परिचायक बने , इसका प्रभाव उत्तराखंड और उत्तर प्रदेश पर पड़ेगा क्योंकि सिख कड़ी है हिन्दू और मुस्लिम के बीच , इसे न टूटने दें , यह सेल्फ वाल का काम करती है , सिख के साथ हिन्दू का वह पोच भी साथ हो लेता है जो कट्टरपंथी नहीं l

गुरू नानक के शब्दों में ” अगाह कू त्राँघ पिछाह फेर न मौहड्ढा , सिझ अविहा वार , बहुड न होवी जन्मढा ” अर्थात आओ आगे कदम बढाएं, जो बीत गया वह बीत गया उसके लिये अपने वर्तमान को क्यों कुर्बान करें , भविष्य में क्या होगा उसके लिये वर्तमान को क्यों गवा दें ” अभी समय है अभी नहीं कुछ भी बिगड़ा है , देखो सुयोग तुम्हारे पास खड़ा है l

इस आशा और उम्मीद के साथ पंजाब ने समय-समय पर देश को नयी दिशा दी, सोते हुए को जगाया , आओ यही संकल्प