किसी भी सभ्य समाज की पहचान इस बात से होती है कि वह अपने सबसे कमजोर माने जाने वाले वर्ग को कितना सम्मान, समानता और अवसर प्रदान करता है। दृष्टिबाधित अथवा नेत्रहीन व्यक्ति समाज की सहानुभूति नहीं, बल्कि अपनी योग्यता सिद्ध करने के लिए समान अवसर चाहते हैं। उन्हें दया का पात्र नहीं, बल्कि सक्षम और सम्मानित नागरिक के रूप में स्वीकार किए जाने की आवश्यकता है।
आज विज्ञान और प्रौद्योगिकी का युग है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता (Artificial Intelligence), डिजिटल संचार तथा सहायक प्रौद्योगिकियों ने उन अनेक बाधाओं को समाप्त कर दिया है, जो कभी दृष्टिबाधित व्यक्तियों की शिक्षा और रोजगार के मार्ग में अवरोध थीं। इसलिए केवल दृष्टि की कमी के आधार पर किसी व्यक्ति को तकनीकी शिक्षा से वंचित रखना न तो न्यायसंगत है और न ही संविधान द्वारा प्रदत्त समानता की भावना के अनुरूप। वास्तव में वे अपनी मानसिक दृष्टि से संसार को समझते हैं और अनेक समस्याओं का समाधान गहन चिंतन के साथ खोज लेते हैं।
दृष्टिबाधित व्यक्तियों में पूर्णतः नेत्रहीन, अल्प दृष्टि वाले तथा दुर्घटना अथवा बीमारी के कारण दृष्टि खो चुके लोग शामिल हैं। उनकी आवश्यकताएँ भले ही अलग-अलग हों, किंतु उनकी क्षमता किसी भी सामान्य व्यक्ति से कम नहीं होती। दुर्भाग्यवश आज भी हमारे समाज में उनके प्रति दया का भाव अधिक दिखाई देता है। बचपन से ही उन्हें अलग विद्यालयों, अलग वातावरण और सीमित अपेक्षाओं में बाँध दिया जाता है। कई बार उनकी रुचि जाने बिना ही संगीत को उनका एकमात्र करियर मान लिया जाता है, जबकि उनमें से अनेक विद्यार्थी विज्ञान, गणित, कंप्यूटर तथा तकनीकी विषयों में विशेष योग्यता रखते हैं।
इतिहास हमें यह शिक्षा देता है कि मनुष्य की योग्यता का मूल्यांकन उसकी शारीरिक क्षमता से नहीं, बल्कि उसकी इच्छाशक्ति, ज्ञान और संकल्प से किया जाना चाहिए। गुरु विरजानंद, जॉन मिल्टन तथा हेलेन केलर जैसी महान विभूतियों ने सिद्ध किया कि दृष्टि का अभाव सफलता की राह में बाधा नहीं बन सकता। उनकी उपलब्धियाँ आज भी समाज के लिए प्रेरणास्रोत हैं।
दृष्टिबाधित व्यक्तियों की सुनने, स्पर्श करने और स्मरण रखने की क्षमता अत्यंत विकसित हो जाती है। वे किसी भी कार्य में गहन एकाग्रता के साथ जुड़ सकते हैं। यही कारण है कि वे संगीत, साहित्य, शिक्षा तथा सूचना प्रौद्योगिकी जैसे क्षेत्रों में निरंतर अपनी प्रतिभा का परिचय दे रहे हैं।
आज NVDA, JAWS, VoiceOver, OCR, TalkBack तथा अन्य स्क्रीन रीडर सॉफ्टवेयर ने दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए शिक्षा के नए द्वार खोल दिए हैं। टॉकिंग बुक्स, डिजिटल पुस्तकालय, स्मार्टफोन एप्लिकेशन तथा कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सहायक तकनीकों ने उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। आज हजारों दृष्टिबाधित युवा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग, डिजिटल सेवाओं, कंटेंट निर्माण, ऑनलाइन शिक्षा तथा सरकारी सेवाओं में सफलतापूर्वक कार्य कर रहे हैं।
सरकार द्वारा आरक्षण, छात्रवृत्तियाँ, सहायक उपकरण तथा अनेक कल्याणकारी योजनाएँ संचालित की जा रही हैं, किंतु इनका लाभ प्रत्येक जरूरतमंद तक नहीं पहुँच पाता। इसलिए जागरूकता बढ़ाने, प्रक्रियाओं को सरल बनाने तथा योजनाओं की प्रभावी निगरानी सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। इसके साथ ही सामान्य विद्यालयों तथा तकनीकी संस्थानों में समावेशी शिक्षा को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
तकनीकी शिक्षा को दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए अधिक सुलभ बनाने हेतु ब्रेल पुस्तकों, डिजिटल ऑडियो सामग्री, स्पर्श आधारित मॉडलों, त्रि-आयामी (3D) शिक्षण सामग्री तथा वॉइस-गाइडेड प्रयोगशालाओं का विकास किया जाना चाहिए। पाठ्यक्रम निर्माण तथा नीति-निर्माण समितियों में दृष्टिबाधित व्यक्तियों की भागीदारी सुनिश्चित करना भी उतना ही आवश्यक है, क्योंकि वे अपनी आवश्यकताओं को सबसे बेहतर ढंग से समझते हैं।
मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज, जालंधर में सक्षम पंजाब के सहयोग से स्थापित गुरु विरजानंद टेक विज़न लैब इस दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल है। यहाँ देश के विभिन्न राज्यों से आए दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को डिजिटल साक्षरता, कंप्यूटर, मोबाइल प्रौद्योगिकी, संचार कौशल तथा रोजगारोन्मुख प्रशिक्षण प्रदान किया जाता है। यह मॉडल देश के अन्य तकनीकी संस्थानों के लिए भी प्रेरणास्रोत बन सकता है।
उचित प्रशिक्षण प्राप्त करने के बाद दृष्टिबाधित व्यक्ति शिक्षक, कंप्यूटर प्रोग्रामर, सॉफ्टवेयर डेवलपर, डिजिटल कंटेंट निर्माता, गुणवत्ता नियंत्रण सहायक, प्रशिक्षक तथा शोध सहयोगी के रूप में सफलतापूर्वक कार्य कर सकते हैं। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उनकी सीमाओं को नहीं, बल्कि उनकी क्षमताओं को पहचानें।
समाज में आज भी अनेक भ्रांतियाँ विद्यमान हैं। दृष्टिबाधित व्यक्तियों को दया की दृष्टि से देखने के स्थान पर उन्हें समानता, सम्मान और अवसर प्रदान किए जाने चाहिए। जब शिक्षा, प्रौद्योगिकी और समाज मिलकर उनके लिए अनुकूल वातावरण तैयार करेंगे, तब वे न केवल अपना जीवन बदलेंगे, बल्कि राष्ट्र के विकास में भी महत्वपूर्ण योगदान देंगे।
वह दिन दूर नहीं जब दृष्टिबाधित व्यक्ति तकनीकी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर, निदेशक, प्राचार्य, वैज्ञानिक तथा नीति-निर्माता के रूप में नेतृत्व करते हुए दिखाई देंगे। उस दिन यह सत्य और अधिक दृढ़ता से स्थापित होगा कि—
“देखने के लिए केवल आँखें नहीं, बल्कि विचारों की दृष्टि और संकल्प का प्रकाश चाहिए।”

— डॉ. जगरूप सिंह
प्राचार्य
मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज, जालंधर