डिफेंस काउंसिल पॉलिसी के विरोध में जिला बार एसोसिएशन, जालंधर का आंदोलन लगातार जारी है। शुक्रवार को भी बार एसोसिएशन द्वारा ‘नो वर्क डे’ मनाया गया। सेशन कोर्ट कॉम्प्लेक्स के मुख्य द्वार के बाहर टेंट लगाकर अधिवक्ताओं ने धरना-प्रदर्शन किया और डिफेंस काउंसिल पॉलिसी के विरोध में जोरदार नारेबाजी करते हुए अपना रोष प्रकट किया। धरने की अध्यक्षता जिला बार एसोसिएशन, जालंधर के प्रधान श्री आदित्य जैन एवं सचिव श्री रोहित गंभीर ने की।

इस अवसर पर प्रधान आदित्य जैन ने कहा कि पंजाब, हरियाणा एवं चंडीगढ़ की सभी बार एसोसिएशन संयुक्त एक्शन कमेटी के बैनर तले लंबे समय से इस नीति के विरोध में संघर्ष कर रही हैं। उन्होंने कहा कि डिफेंस काउंसिल पॉलिसी का उद्देश्य आर्थिक रूप से कमजोर एवं वास्तविक जरूरतमंद लोगों को निःशुल्क कानूनी सहायता उपलब्ध करवाना था, लेकिन वर्तमान समय में इस नीति का व्यापक स्तर पर दुरुपयोग हो रहा है। उन्होंने कहा कि जिन लोगों को इस सुविधा की आवश्यकता नहीं है, वे भी इसका लाभ उठा रहे हैं, जिससे निजी तौर पर वकालत करने वाले अधिवक्ताओं, विशेषकर युवा वकीलों, की आजीविका पर गंभीर प्रभाव पड़ रहा है।

सचिव रोहित गंभीर ने अपने संबोधन में कहा कि अधिवक्ता केवल मुकदमे लड़ने का कार्य नहीं करते, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करने और न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने कहा कि डिफेंस काउंसिल पॉलिसी मूल रूप से सीमित उद्देश्य के लिए लाई गई थी, ताकि आर्थिक रूप से कमजोर और वास्तव में जरूरतमंद लोगों को कानूनी सहायता मिल सके। लेकिन आज इस नीति का उपयोग निजी अधिवक्ताओं की वकालत को समाप्त करने के लिए किया जा रहा है, जिसे अधिवक्ता समुदाय किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं करेगा।

उन्होंने कहा कि यह केवल अधिवक्ताओं के रोजगार का विषय नहीं है, बल्कि लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था का भी प्रश्न है। सरकार से वेतन लेने वाले अधिवक्ताओं से स्वतंत्र और निष्पक्ष न्याय की अपेक्षा करना गंभीर चिंता का विषय है। उन्होंने आरोप लगाया कि इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल अदालतों का लंबित कार्य कम करना नहीं होना चाहिए, बल्कि प्रत्येक नागरिक को निष्पक्ष, प्रभावी और गुणवत्तापूर्ण न्याय उपलब्ध कराना होना चाहिए।

रोहित गंभीर ने कहा कि यदि इस नीति को शीघ्र समाप्त नहीं किया गया तो इसका दूरगामी प्रभाव स्वतंत्र वकालत और न्याय व्यवस्था पर पड़ेगा। उन्होंने कहा कि अधिवक्ता समुदाय इस नीति को समाप्त कराने के लिए अपना लोकतांत्रिक संघर्ष जारी रखेगा और जब तक इस नीति को वापस नहीं लिया जाता, आंदोलन लगातार चलता रहेगा।

उन्होंने आगे बताया कि संयुक्त एक्शन कमेटी के निर्णय के अनुसार शनिवार को आयोजित होने वाली राष्ट्रीय लोक अदालत का भी अधिवक्ता समुदाय पूर्ण रूप से विरोध करेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि कोई भी अधिवक्ता लोक अदालत में उपस्थित होकर किसी भी मामले की पैरवी नहीं करेगा। उन्होंने सभी अधिवक्ताओं से संयुक्त एक्शन कमेटी के निर्णय का पूर्ण समर्थन करने और एकजुट रहने की अपील की।

जैन एवं गंभीर ने बातचीत के दौरान ने यह भी स्पष्ट किया कि जिला बार एसोसिएशन का विरोध निःशुल्क विधिक सहायता (लीगल एड) प्रदान करने के उद्देश्य से नहीं है, बल्कि वर्तमान एल.ए.डी.सी. (डिफेंस काउंसिल) व्यवस्था से है। उन्होंने बताया कि पूर्व से लागू लीगल एड पैनल प्रणाली के अंतर्गत आज भी लगभग 50 से 60 अधिवक्ता पैनल पर कार्यरत हैं। यदि विधिक सहायता से संबंधित समस्त कार्य केवल छह डिफेंस काउंसिलों तक सीमित रखने के बजाय उक्त पैनल के सभी अधिवक्ताओं को समान रूप से आवंटित किया जाए, चाहे उनकी संख्या बढ़ाकर 80 या 100 ही क्यों न करनी पड़े, तो बार को इस व्यवस्था पर कोई आपत्ति नहीं होगी। उनका कहना था कि इससे अधिक से अधिक अधिवक्ताओं को कार्य करने का अवसर मिलेगा तथा विधिक सहायता का उद्देश्य भी प्रभावी ढंग से पूरा होगा।

धरने के दौरान अधिवक्ताओं ने सरकार से डिफेंस काउंसिल पॉलिसी को तत्काल समाप्त करने की मांग की। उन्होंने कहा कि अधिवक्ता समुदाय न्याय व्यवस्था की स्वतंत्रता, अधिवक्ताओं के सम्मान तथा उनके भविष्य की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है और यह आंदोलन तब तक जारी रहेगा जब तक उनकी मांगों पर सकारात्मक निर्णय नहीं लिया जाता।

इस अवसर पर प्रधान श्री आदित्य जैन एवं सचिव श्री रोहित गंभीर के नेतृत्व में धरना-प्रदर्शन किया गया, जिसमें जिला बार एसोसिएशन, जालंधर के सीनियर उपप्रधान श्री राम छाबड़ा, संयुक्त सचिव श्री साहिल मल्होत्रा, जूनियर उपप्रधान श्री सूरज प्रताप सिंह, असिस्टेंट सेक्रेटरी मिस सोनालिका, एग्जीक्यूटिव मेंबर्स श्री प्रभु धीर, श्री विजय मिश्रा, श्री पारस चौधरी, श्री अमानत भगत, सुश्री पायल हीर, सुश्री नेहा अत्तरी एवं श्री मनिंदर सतदेवा के अलावा गुरमैल सिंह लिधड़, आर.के. भल्ला, बलविंदरजीत सिंह (लकी), ओ.पी. शर्मा, पवन मल्होत्रा, सतनाम सिंह हुंडल, तजिंदर ढालीवाल, प्रीतपाल सिंह, बृजेश बक्शी, विशाल पृथी, अमरिंदर सिंह थिंद, राकेश धीर, दिनेश कुमार जस्सी, रवीश मल्होत्रा, तरसेम सिंह ठाक, परमजीत सिंह मक्कड़, राजेश वर्मा, भूपिंदर पाल सिंह, जी.के. अग्निहोत्री, नरिंदर सिंह, करम पाल सिंह गिल, अशोक कुमार शर्मा, दविंदर मौदगिल, बलदेव प्रकाश राल्ह, कुलवीर सिंह मिन्हास, सनी कुमार, हरप्रीत सिंह, कुणाल गोयल, विशाल वरियाच, लकी, निखिल शर्मा, संजीव बंसल, अंकुर बंसल, अनुज बंसल, बीना रानी, रवीना, अंजली विरदी, मानवी उप्पल, अनु सोढ़ी, नेहा गुलाटी, शिवानी, बलविंदर कौर, मधु रचना, अमनदीप कौर, सुषमा रानी एवं मनवीर कौर सहित बड़ी संख्या में अधिवक्ताओं ने भाग लिया तथा एल.ए.डी.सी. नीति के विरुद्ध अपना प्रबल विरोध दर्ज कराया।