

जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में श्री शनि देव महाराज जी के निमित्त सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान राकेश प्रभाकर से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि अपनी दिव्य आभा से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर रही थी। इसी पावन वातावरण में धाम के पीठ उपासक नवजीत भारद्वाज ने संत गुरु रविदास महाराज के प्रसिद्ध दोहे की व्याख्या करते हुए कहा कि
*‘‘प्रभु जी तुम चंदन हम पानी,*
*जाकी अंग-अंग बास समानी।*
*प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,*
*जैसे चितवत चंद चकोरा॥’’*
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को दोहे के भाव समझाते हुए कहा कि इंसान इस दोहे को केवल पढ़े नहीं, बल्कि अपने जीवन में उतार लें। उन्होंने कहा कि संत गुरु रविदास जी यह नहीं कहते कि मैं बहुत ज्ञानी हूं, मैं बहुत बड़ा भक्त हूं, मैंने बहुत पूजा-पाठ किया है। वह कहते हैं, *‘‘प्रभु जी तुम चंदन, हम पानी’’* यानी प्रभु चंदन हैं और मैं पानी हूं। चंदन की अपनी सुगंध होती है, लेकिन जब चंदन पानी के साथ घुलता है तो उसकी खुशबू पानी के कण-कण में फैल जाती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि संतों ने प्रभु से मांगने का तरीका ही बदल दिया। संत कहते है कि हे प्रभु! मुझे कुछ मत दो, बस मुझे अपने रंग में रंग दो। क्योंकि जब इंसान प्रभु के रंग में रंग जाता है, तब परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उसके भीतर शांति बनी रहती है।
नवजीत भारद्वाज जी दोहे का सार समझाते हुए प्रभु भक्तों को कहते है कि चंदन बनने की जरूरत नहीं, पानी बनने की जरूरत है। पानी कभी अपने लिए घमंड नहीं करता। वह जिस पात्र में डाल दो, उसी का आकार ले लेता है। नीचे की ओर बहता है, फिर भी जीवन देता है। इसीलिए संतों ने विनम्रता को भक्ति का आभूषण माना है। जिस दिन इंसान के अंदर से यह निकल गया कि मैं ही सही हूं, मैं ही बड़ा हूं, मेरी ही बात अंतिम है, उसी दिन उसके भीतर प्रभु के लिए जगह बननी शुरू हो जाती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने दोहे की अमूल्य पंक्तियों का स्मरण करते हुए कहा है कि *‘‘प्रभु जी तुम घन बन हम मोरा,जैसे चितवत चंद चकोरा॥’’* अर्थात् जैसे तपती धरती पर बादल आते हैं तो मोर नाच उठता है, वैसे ही जब भक्त को प्रभु की उपस्थिति का अनुभव होता है तो उसका मन आनंद से झूम उठता है। जैसे चकोर पक्षी चंद्रमा को निहारता रहता है, वैसे ही भक्त की आंखें प्रभु दर्शन को तरसती हैं।
दोहे की इन पंक्तियों की गहराई समझाते हुए उन्होंने कहा कि मोर को बादल दिखाई देने पर किसी धन की आवश्यकता महसूस नहीं होती और चकोर को चंद्रमा के दर्शन में ही आनंद मिल जाता है। यही सच्चे प्रेम की पहचान है। सच्चा भक्त प्रभु से यह नहीं कहता कि ‘‘मुझे यह दे दो, वह दे दो।’’ वह तो केवल प्रभु की उपस्थिति को ही अपने जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य मानता है
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को संदेश देते हुए कहा कि संत गुरु रविदास जी की इन पंक्तियों से एक संकल्प लेकर उठिए कि हमें अपने भीतर चंदन बनने का अहंकार नहीं, बल्कि पानी जैसी विनम्रता पैदा करनी है। प्रभु से संसार की वस्तुओं की लंबी सूची मांगने के बजाय उनके प्रेम की एक बूंद के लिए प्रार्थना करनी है। जिस दिन भक्त प्रभु से यह कहना सीख जाता है कि ‘‘प्रभु, मेरी इच्छा नहीं, आपकी इच्छा सर्वोपरि है’’ , उसी दिन उसके जीवन में शिकायतें कम और शांति अधिक होने लगती है।
इस अवसर पर श्वेता भारद्वाज, सुनील प्रभाकर,पूनम प्रभाकर ,सरोज बाला, समीर कपूर, विक्की अग्रवाल,प्रदीप , दिनेश सेठ,रोहित भाटिया,जानू थापर,दिनेश,नरेश,ऋषभ कालिया,अजीत कुमार , नरेंद्र,राकेश शर्मा,प्रदीप, सुधीर, सुमीत,मनीष शर्मा, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू,संजीव शर्मा,मुकेश, रजेश, गुरप्रीत सिंह, विरेंद्र सिंह, अमन शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी, भोला शर्मा,दीलीप, लवली, लक्की,विशाल, रवि भल्ला, भोला शर्मा, जगदीश, नवीन कुमार, निर्मल,अनिल,सागर,नरेंद्र, सौरभ, नरेश,दिक्षित, अनिल, कमल सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ उपरांत लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।



