
जालंधर: आज के समय की आवश्यक शिक्षा वह शिक्षा है जिसे प्राप्त करके कोई भी विद्यार्थी न केवल अपने पैरों पर खड़ा हो सकता है, बल्कि अपने परिवार का पालन-पोषण भी कर सकता है और अपने कौशल, प्रतिभा तथा अनुभव के माध्यम से देश की अमूल्य सेवा भी कर सकता है। इसे कौशल आधारित शिक्षा भी कहा जाता है। कौशल का अर्थ है किसी विशेष कला, क्षेत्र या तकनीक में दक्षता प्राप्त करना। जैसे सीएनसी मशीनों का संचालन करना, एयर कंडीशनर या रेफ्रिजरेटर की मरम्मत करना, नक्शे बनाना, प्लंबिंग का कार्य करना, इलेक्ट्रीशियन या डीजल मैकेनिक बनना आदि। एक समय था जब कहा जाता था कि प्रत्येक विद्यार्थी के लिए माता सरस्वती की कृपा आवश्यक है, क्योंकि वे विद्या की देवी हैं। परंतु आज के समय में माता सरस्वती की कृपा के साथ-साथ भगवान विश्वकर्मा का आशीर्वाद भी उतना ही आवश्यक है। भगवान विश्वकर्मा को कर्मयोगियों और अभियंताओं (इंजीनियरों) का देवता माना जाता है। इसलिए भारत में रहने वाले करोड़ों कामगारों के लिए कौशल आधारित शिक्षा अत्यंत आवश्यक है।
हर व्यक्ति में कोई न कोई प्रतिभा और हुनर होता है। किसी का हुनर छिपा रह जाता है, किसी का प्रसिद्ध हो जाता है, किसी का दबा रह जाता है और किसी का निखरकर सामने आ जाता है।
आज के विद्यार्थियों को चाहिए कि वे अपनी रुचि, शौक और झुकाव के अनुसार किसी कौशल का चयन करें। चाहे वे वाणिज्य (कॉमर्स) के विद्यार्थी हों या कला (आर्ट्स) के, उनके पास कोई न कोई व्यावसायिक कौशल अवश्य होना चाहिए। व्यावसायिक शिक्षा का क्षेत्र अत्यंत विशाल है। इसमें अनेक प्रकार के पाठ्यक्रम और प्रशिक्षण कार्यक्रम उपलब्ध हैं, जो लड़कों और लड़कियों दोनों के लिए समान रूप से उपयोगी हैं। दिव्यांग बच्चे, पढ़ाई छोड़ चुके विद्यार्थी, ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चे तथा पिछड़े वर्गों के विद्यार्थी भी अपनी पसंद का पाठ्यक्रम चुन सकते हैं।
कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर, इलेक्ट्रीशियन, ड्राफ्ट्समैन, मोबाइल मरम्मत, कला एवं शिल्प, आभूषण डिजाइनिंग, ऑटोमोबाइल परीक्षण एवं मरम्मत, टूल एवं डाई निर्माण, मल्टीमीडिया, फोटोग्राफी, ए.आई. , रोबोटिक्स इंटीरियर डिजाइनिंग, सौंदर्य विशेषज्ञ (ब्यूटीशियन), फैशन डिजाइनिंग, कटिंग एवं सिलाई, कैड-कैम, पर्यटन एवं आतिथ्य सेवा, मेडिकल प्रयोगशाला तथा स्वास्थ्य सेवा जैसे सैकड़ों पाठ्यक्रम उपलब्ध हैं। मान्यता प्राप्त संस्थानों से छह माह या एक वर्ष का प्रशिक्षण प्राप्त करके विद्यार्थी आत्मनिर्भर बन सकते हैं। वे नौकरी प्राप्त कर सकते हैं या अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं।
जिन परिवारों के पास आर्थिक संसाधन उपलब्ध हैं या जो विद्यार्थी और अधिक ऊँचे लक्ष्य प्राप्त करना चाहते हैं, उनके लिए भी अनेक अवसर हैं। विद्यार्थी दसवीं कक्षा के बाद दो वर्षीय औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान (आईटीआई) या तीन वर्षीय डिप्लोमा करके तकनीशियन अथवा कनिष्ठ अभियंता (जूनियर इंजीनियर) बन सकते हैं। डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में सिविल, इलेक्ट्रिकल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर, ऑटोमोबाइल, चमड़ा प्रौद्योगिकी, रासायनिक प्रौद्योगिकी तथा फार्मेसी जैसे विषय विशेष रूप से लोकप्रिय हैं।
बारहवीं (चिकित्सा या गैर-चिकित्सा) उत्तीर्ण विद्यार्थी लेटरल एंट्री के माध्यम से सीधे डिप्लोमा के द्वितीय वर्ष में प्रवेश प्राप्त कर सकते हैं। इसी प्रकार व्यावसायिक शिक्षा या आईटीआई उत्तीर्ण विद्यार्थी भी डिप्लोमा के दूसरे वर्ष में प्रवेश पा सकते हैं। डिप्लोमा पूर्ण करने के बाद वे लेटरल एंट्री द्वारा बी.टेक. के दूसरे वर्ष में प्रवेश लेकर अभियंता बनने का अपना सपना पूरा कर सकते हैं। हालांकि ऐसा डिप्लोमा किसी प्रतिष्ठित और मान्यता प्राप्त पॉलिटेक्निक संस्थान से ही करना चाहिए।
हुनर है तो स्वतंत्रता है, हुनर है तो सुरक्षा है। हुनर आपके हाथ में वह छेनी है, जिससे आप अपने सपनों और भविष्य को आकार दे सकते हैं।
हमारे देश की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इसलिए भारत को युवाओं का देश भी कहा जाता है। लेकिन दुर्भाग्यवश युवाओं का एक बड़ा वर्ग विदेश जाने की होड़ में लगा हुआ है। यदि हम इस प्रतिभा पलायन (ब्रेन ड्रेन) को रोकना चाहते हैं, तो युवाओं को रोजगार देना होगा तथा उन्हें उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशिक्षित करना होगा। यदि हम इसमें सफल होते हैं, तो आने वाले समय में युवा विदेशों में बसने के बजाय अपने देश में ही अवसर तलाशेंगे।
इसी उद्देश्य से माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने 15 जुलाई 2015 को “स्किल इंडिया मिशन” की शुरुआत की। इसका उद्देश्य बड़ी संख्या में तकनीकी रूप से दक्ष और प्रशिक्षित युवाओं को तैयार करना है, जो उद्योगों की आवश्यकताओं के अनुरूप हों। “प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना” इसी मिशन का एक महत्वपूर्ण भाग है। इसके साथ ही राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन तथा कौशल ऋण योजना जैसी योजनाएँ भी प्रारंभ की गईं ताकि युवाओं को प्रशिक्षण और रोजगार के बेहतर अवसर मिल सकें।
इन योजनाओं के अंतर्गत कौशल मेले आयोजित किए जाते हैं, प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले विद्यार्थियों को छात्रवृत्ति प्रदान की जाती है तथा प्रशिक्षण संस्थानों को रोजगार उपलब्ध कराने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। यद्यपि अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है, फिर भी यह एक सकारात्मक और सराहनीय पहल है।
“स्किल इंडिया” का अगला महत्वपूर्ण चरण “स्टार्टअप इंडिया” है, जिसकी शुरुआत 16 जनवरी 2016 को की गई। इसका मुख्य उद्देश्य युवाओं में उद्यमिता की भावना को बढ़ावा देना तथा नए विचारों, नवाचारों और व्यावसायिक प्रयोगों को प्रोत्साहित करना है। यदि करोड़ों प्रशिक्षित युवाओं को रोजगार उपलब्ध कराना है, तो नए उद्योगों, कारखानों और व्यवसायों की आवश्यकता होगी। यह कार्य नए उद्यमी ही कर सकते हैं।
भारत में प्रत्येक व्यक्ति को नौकरी देना संभव नहीं है। इसलिए आवश्यकता है कि युवा केवल नौकरी खोजने वाले न बनें, बल्कि रोजगार प्रदान करने वाले बनें। व्यावसायिक शिक्षा इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण समाधान है। यह न केवल बेरोजगारी को कम कर सकती है, बल्कि समाज में बढ़ती नशे जैसी समस्याओं पर भी नियंत्रण स्थापित करने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
मुझे विश्वास है कि—
“हाथों में हुनर होगा तो हर समस्या का समाधान निकलेगा,
रात के अंधेरों के बाद सुनहरा भविष्य अवश्य निकलेगा।”
डॉ. जगरूप सिंह
प्राचार्य
मेहर चंद पॉलिटेक्निक कॉलेज, जालंधर।