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दवा निर्माताओं को एक हफ्ते के भीतर अपने कारखानों में लगाने पड़ सकते हैं ताले , जाने क्यों

दिल्ली: पश्चिम एशिया में छिड़े भीषण संघर्ष ने अब न केवल वैश्विक राजनीति बल्कि आम आदमी की सेहत और रसोई पर भी सीधा प्रहार करना शुरू कर दिया है। युद्ध के कारण पैदा हुए ऊर्जा संकट ने भारत के फार्मास्युटिकल यानी दवा उद्योग के सामने अस्तित्व की चुनौती खड़ी कर दी है। ईरान द्वारा सामरिक रूप से महत्वपूर्ण ‘हॉर्मुज जलडमरूमध्य’ को बंद किए जाने से वैश्विक सप्लाई चेन पूरी तरह चरमरा गई है। इसका सबसे बुरा असर भारत में गैस के आयात पर पड़ा है, जिससे बुखार से लेकर डायबिटीज तक की जरूरी दवाओं का उत्पादन ठप होने की कगार पर है।भारतीय फार्मा कंपनियों के लिए प्रोपेन गैस एक अनिवार्य ईंधन की तरह काम करती है, जिसका उपयोग दवाओं को बनाने वाले बॉयलरों में होता है। वर्तमान में एलएनजी आयात में आई भारी बाधा के कारण गुजरात, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे प्रमुख दवा उत्पादन केंद्रों की स्थिति नाजुक हो गई है। कई बड़ी कंपनियों के पास अब केवल 10 दिनों का स्टॉक शेष बचा है। यदि युद्ध के कारण गैस आपूर्ति का यह अवरोध जल्द समाप्त नहीं हुआ, तो करीब 200 से अधिक दवा निर्माताओं को अगले एक हफ्ते के भीतर अपने कारखानों में ताले लगाने पड़ सकते हैं।

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