स्नातकोत्तर जूलॉजी विज्ञान विभाग ने आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ, भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ तथा कर्मचारी परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में “भारतीय ज्ञान परंपराएँ और अनुसंधान के अवसर” विषय पर आधारित एक फैकल्टी डेवलपमेंट प्रोग्राम का सफल आयोजन किया। यह कार्यक्रम भारत सरकार के जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा प्रायोजित था। इसका मुख्य उद्देश्य प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा तथा समकालीन वैज्ञानिक अनुसंधान के बीच समन्वय स्थापित करना और दोनों के मध्य की दूरी को कम करना था।

कार्यक्रम का शुभारंभ डी.ए.वी.गान की मधुर प्रस्तुति के साथ हुआ, जिसके पश्चात पारंपरिक दीप प्रज्वलन किया गया। यह दीप प्रज्वलन ज्ञान के प्रकाश द्वारा अज्ञान के अंधकार को दूर करने का प्रतीक रहा।

कर्मचारी सचिव एवं पूर्व छात्र संघ के अधिष्ठाता डॉ. पुनीत पुरी ने मुख्य वक्ता का परिचय प्रस्तुत किया तथा भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ की आवश्यकता पर विशेष बल दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय ज्ञान परंपरा कोई अलग विषय नहीं, बल्कि एक ऐसा मूलभूत आधार है जो प्रत्येक शैक्षणिक अनुशासन के साथ मिलकर समग्र नवाचार और विकास को गति प्रदान कर सकता है।

तकनीकी सत्र का नेतृत्व काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी के भूगोल विभाग के प्रतिष्ठित विद्वान डॉ. रिपुदमन सिंह ने किया।

डॉ. सिंह ने भारतीय ज्ञान परंपरा में निहित विशाल अनुसंधान क्षेत्र का अत्यंत सरल, स्पष्ट एवं प्रभावशाली विवरण प्रस्तुत किया। उन्होंने इसकी बहुविषयक प्रकृति को उजागर करते हुए प्राचीन पद्धतियों को विभिन्न विषयों से जोड़ा, जैसे—

रसायन विज्ञान : पारंपरिक धातु विज्ञान एवं रसायन साधना की विवेचना।

राजनीति विज्ञान : प्राचीन शासन व्यवस्था एवं कूटनीति (नीति शास्त्र) का विश्लेषण।

इतिहास एवं भूगोल : स्वदेशी मानचित्र निर्माण तथा ऐतिहासिक भूमि उपयोग की समझ।

अपने संबोधन में डॉ. सिंह ने कहा कि भारतीय ज्ञान परंपरा अनुभव आधारित तथ्यों का एक अमूल्य भंडार है, जो कठोर विज्ञान से लेकर मानविकी तक, सभी क्षेत्रों में समान रूप से उपयोगी और प्रासंगिक है।

महाविद्यालय प्रशासन द्वारा मुख्य वक्ता का अत्यंत आत्मीय स्वागत किया गया। उप-प्राचार्या प्रो. सोनिका दानिया ने डॉ. सिंह को एक हरित पौधा तथा स्मृति चिन्ह भेंट कर सम्मानित किया, जो महाविद्यालय की पर्यावरण संरक्षण, विकास तथा परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता का प्रतीक था। स्वागत दल में निम्नलिखित सदस्य सम्मिलित रहे—

डॉ. दिनेश अरोड़ा (अधिष्ठाता, आंतरिक गुणवत्ता आश्वासन प्रकोष्ठ एवं भारतीय ज्ञान परंपरा प्रकोष्ठ प्रभारी)

डॉ. पुनीत पुरी (कर्मचारी सचिव)

डॉ. ऋषि कुमार (संयुक्त सचिव, कर्मचारी परिषद्)

इस सत्र में अध्यापक वर्ग की अत्यंत सक्रिय सहभागिता देखने को मिली। सभी शिक्षकों ने प्रश्नोत्तर सत्र में उत्साहपूर्वक भाग लिया तथा इस विषय पर चर्चा की कि किस प्रकार वे अपने-अपने विभागों के अनुसंधान कार्यों में भारतीय ज्ञान परंपरा से संबंधित घटकों को सम्मिलित कर सकते हैं।

प्रशंसा और प्रोत्साहन के रूप में कार्यक्रम में भाग लेने वाले प्रत्येक शिक्षक को सहभागिता प्रमाण पत्र तथा स्मृति स्वरूप एक उपयोगी थैला प्रदान किया गया, जिसे जैव प्रौद्योगिकी विभाग द्वारा प्रायोजित किया गया था।

कार्यक्रम का समापन डॉ. दिनेश अरोड़ा द्वारा प्रस्तुत औपचारिक धन्यवाद प्रस्ताव के साथ हुआ। उन्होंने मुख्य वक्ता को उनके प्रेरणादायक विचारों के लिए तथा जैव प्रौद्योगिकी विभाग को इस कार्यक्रम के सफल आयोजन में प्रदान किए गए सहयोग हेतु हार्दिक आभार व्यक्त किया।