जालंधर: 2 जून 2026 को जब हम 1984 की घटनाओं को याद करते हैं, तो अनेक प्रश्न आज भी अनुत्तरित दिखाई देते हैं। 2 जून 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने राष्ट्र के नाम अपने संदेश में कहा था:
“यह क्रोध का समय नहीं है। बहुत रक्त बह चुका है। हिंसा केवल प्रतिहिंसा को जन्म देती है। कुछ भटके हुए लोग यह सोचते हैं कि आतंकवाद का मुकाबला इसी प्रकार किया जा सकता है, लेकिन इससे अधिक खतरनाक और निरर्थक सोच कोई नहीं हो सकती। आइए, हम सब मिलकर पंजाब में सामान्य स्थिति और सौहार्द बहाल करें। मैं अपील करती हूं कि रक्त नहीं, घृणा का त्याग करें।”
प्रश्न यह है कि यदि प्रधानमंत्री का दृष्टिकोण संवाद, शांति और समाधान का था, तो घटनाएं इसके बिल्कुल विपरीत दिशा में क्यों चली गईं?
पिछले चार दशकों में अनेक पुस्तकें, संस्मरण और लेख प्रकाशित हुए। राज्यपालों, सुरक्षा अधिकारियों और राजनेताओं ने सेवानिवृत्ति के बाद अपने-अपने दृष्टिकोण प्रस्तुत किए। किंतु इतिहास का मूल्यांकन करते समय यह भी देखना होगा कि निर्णय लेने वाले संस्थानों और व्यक्तियों की वास्तविक भूमिका क्या थी।
पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी ने अपनी पुस्तक My Country My Life में 1984 के घटनाक्रम का उल्लेख करते हुए लिखा है कि भारतीय जनता पार्टी ने उस समय सरकार पर कार्रवाई के लिए दबाव बनाने हेतु आंदोलन चलाया था। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनकी पार्टी ने उस संघर्ष में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इन संदर्भों के आधार पर कुछ विश्लेषक यह तर्क देते हैं कि उस समय का राजनीतिक वातावरण केंद्र सरकार पर कठोर कदम उठाने का दबाव बना रहा था।
दूसरी ओर, यह भी सत्य है कि पंजाब संकट के समाधान में राजनीतिक नेतृत्व, अकाली दल, प्रशासनिक तंत्र और विभिन्न संस्थाएं अपेक्षित भूमिका निभाने में सफल नहीं रहीं। परिणामस्वरूप स्थिति टकराव की ओर बढ़ती गई और अंततः ऑपरेशन ब्लू स्टार जैसी त्रासद घटना सामने आई।
इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या और फिर 1984 के सिख-विरोधी दंगों ने देश की आत्मा को गहरा आघात पहुंचाया। हजारों निर्दोष लोगों ने जान गंवाई। आज भी अनेक परिवार न्याय और उत्तरों की प्रतीक्षा में हैं।
इतिहास का निष्पक्ष अध्ययन यह मांग करता है कि किसी एक समुदाय को सामूहिक रूप से दोषी ठहराने के बजाय उन राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक परिस्थितियों को समझा जाए जिन्होंने देश को उस संकट तक पहुंचाया। दुर्भाग्यवश, कई बार प्रचार और प्रतिप्रचार के बीच वास्तविक तथ्यों पर गंभीर चर्चा पीछे छूट गई।
डॉ. मनमोहन सिंह द्वारा 1984 के दंगों के लिए संसद में व्यक्त किया गया खेद और माफी का भाव भारतीय लोकतंत्र में नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करने का एक महत्वपूर्ण उदाहरण था। इसी प्रकार विभिन्न आयोगों और समितियों ने भी समय-समय पर अल्पसंख्यकों की स्थिति और अधिकारों पर ध्यान आकर्षित किया।
आज आवश्यकता अतीत के घावों को कुरेदने की नहीं, बल्कि उनसे सीख लेने की है। भारत की शक्ति उसकी विविधता, लोकतंत्र और सहअस्तित्व की परंपरा में निहित है। सिख, हिंदू, मुस्लिम, ईसाई और अन्य सभी समुदाय इस राष्ट्र के समान भागीदार हैं।
1980 के दशक की घटनाएं हमें यह सिखाती हैं कि संवाद का विकल्प टकराव नहीं हो सकता। नफरत समाज को कमजोर करती है, जबकि संवाद और विश्वास उसे मजबूत बनाते हैं।
अंततः निर्णय पाठकों पर छोड़ता हूं। इतिहास को पूर्वाग्रह से नहीं, तथ्यों और विवेक से पढ़ना चाहिए। यदि हम अतीत की गलतियों से सीखकर परस्पर सम्मान और भाईचारे का मार्ग अपनाएं, तभी उन दुखद घटनाओं की वास्तविक स्मृति और श्रद्धांजलि होगी।
यह संस्करण मूल विचारों को बनाए रखते हुए भाषा और प्रस्तुति को अधिक संतुलित तथा लेख-शैली के अनुरूप बनाता है।