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सिख और मुस्लिम कहाँ हैं, कॉकरोच आखिरकार हिन्दू बनाम हिन्दू

जालंधर: मैंने पिछले दिनों गांधी शांति प्रतिष्ठान दिल्ली में आशुतोष रांका का भाषण सुना , उस दिन मैंने अपनी प्रतिक्रिया भी दी उसे दोहराना नहीं चाहता l कल मुझे जयपुर से एक टेलीफोन आया जिसमें मुझे कहा गया आप सिख और मुस्लिम को इस आंदोलन में शामिल होने के लिए कहें, मैं हैरान था मैं कोई ऐसा नेता तो हूं ही नहीं जिसकी आवाज सिख और मुस्लिम मान लें, स्वाभाविक ही उस समय मैं दिल्ली के काफी होम में कुछ सामाजिक और राजनीतिक मित्रों के साथ बैठक में चर्चा में शामिल था, यही बात मेरे सम्मुख उन्होंने भी रखी कि सिख और मुस्लिम इस आंदोलन में दूरी बनाये हैं, उनको भी शामिल होना चाहिए, मैं सोच रहा था ऐसा क्या है जो मुझे कहा जा रहा हो, फिर थोड़ा समझने की कोशिश की तो महसूस हुआ शायद;

1. मैंने 1984 के सिख कत्लेआम को नजदीक से देखा क्योंकि उस समय मुझे मौका मिला सरदार हुक्म सिंह पूर्व लोकसभा अध्यक्ष के साथ जब वे सिंह सभा शताब्दी कमेटी के अध्यक्ष और मैं उस सभा का संगठन सचिव, मैंने जे पी आंदोलन और फिर जनता सरकार और इंदिरा गांधी के 1980 से 1984 के कार्यकाल को देखा और समझा, फिर उसके जो नतीजे सामने आए उनका समय-समय पर विश्लेषण भी किया, मुझे मौका मिला चंद्रशेखर सरकार को समझने का और पंजाब खास तौर पर सिख दर्द को उनके सामने रखने का, पर सिख उस समय आगे न बढ़ सके, यदि कुछ होने के नज़दीक कदम रखे सरकार ज़्यादा समय न रही l

2. फिर प्रो शेर सिंह पूर्व केन्द्रीय मंत्री और आर्यसमाजी नेता के साथ मिलकर पंजाब और सिखों में आपसी समझ विकसित हो, काफी उत्साहपूर्ण वातावरण रहा, खालसा की त्रिशति पर जन्म स्थली पटना साहिब से कर्म स्थली आनंदपुर साहिब तक यात्रा की, मैं हैरान था सिख और आर्य नज़दीक पांच मुद्दों पाखंड, जातिवाद, शोषण, नशा और भय मुक्त भारत का संकल्प, नतीजा मुरली मनोहर जोशी HRD मंत्री थे उन्होंने गुरु गोबिंद सिंह चेयर की स्थापना गुरु कुल कांगडी विश्वविद्यालय के लिए एक करोड़ रुपये कारपस फंड के तौर पर विश्वविद्यालय को दिए अफसोस पंजाबी आर्य समाजी इसे करने में आनाकानी कर गया , वह न हो सका l फिर मेरे जीवन में प्रथम मौका आया जब गुरु अरजन साहिब की शहादत के 400 वें वर्ष को समर्पित संगोष्ठी का आयोजन दया नन्द महिला महा विद्यालय कुरुक्षेत्र में आयोजित किया गया “हक ए अमन ” जिसमें तत्कालीन राज्यपाल हरियाणा डा ए आर किदवई, तमिलनाडु के राज्यपाल सुरजीत सिंह बरनाला, केन्द्रीय मंत्री सीस राम ओला, दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री साहिब सिंह वर्मा, पूर्व केन्द्रीय मंत्री दौलत राम सारण उधर शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबन्धक कमेटी से मनजीत सिंह कलकत्ता महा सचिव एवं रूप सिंह नतीजा पंजाब शांति की ओर अग्रसर हो गया l

3. अन्ना आंदोलन को संघ ने खड़ा किया केजरीवाल को आगे कर India against corruption तो केवल एक bahana था मुद्दा तो मनमोहन सिंह सरकार को गिराना था क्योंकि कुछेक संघ के पदाधिकारी शिकंजे में फंसते नज़र आए मुस्लिम निशाने पर, फिर इस हालात को समझने के लिए वेंई नदी पंजाब जहां से गुरु नानक ने प्रथम यात्रा सोधन धरत लोकाई के लिए चल पड़े से गंगा नदी बनारस तक मुझे खुशी जब गांधी शांति प्रतिष्ठान की अध्यक्षा बहिन राधा भट्ट भी साथ चल पड़ी, इससे गांधी जनों से वार्ता का मौका मिला जिसकी प्रशंसा तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी की, इस यात्रा से हिन्दू और मुस्लिम के बीच के तनाव को समझ सका उस समय अनुभव हुआ सिख ही है जो हिन्दू और मुस्लिम के बीच कड़ी है, शायद सिख य़ह बात समझ नहीं पा सके l

4. गुरु ग्राम में मुस्लिम को जुम्में की नमाज़ पार्कों में करने पर रुकावट पैदा की जाती थी तब सिखों ने गुरुद्वारा परिसर में करने के लिए कहा बहुत ही हो हल्ला मचा फिर भी सिखों की इस खुल दिली ने नए रिश्ते पैदा किये, जो 13 महीने सर्दियों और गर्मियों को किसान झेलते रहे 800 से अधिक किसान शहीद हो गए कोई सरकार के कानों में जूँ तक न रेंगी, केवल इस एक कदम ने पूरे दृश्य को बदल दिया माननीय प्रधानमंत्री मोदी ने उसी दिन खेती कानून वापिस लेते हुए माफी मांगी, यह है ताकत सिख मुस्लिम में आपसी समझ की क्योंकि यह 24 फीसद वोट को ही एक नहीं बल्कि 20 फीसद जो हिन्दू सेकुलर मिजाज़ रखते है वो भी साथ आ जाते हैं कॉंग्रेस इसी गणित को भुनाने में कामयाब रहीं , गलती तब कर गयी जब इंदिरा गांधी और सिखों के बीच के संबन्धों को संघ ने बड़े करीने से भंग कर दिया य़ह इंदिरा गांधी और अडवाणी की किताब my country my life से समझा जा सकता है, मनमोहन सिंह सरकार का यही करिश्मा था जिसे शायद कॉंग्रेस और राहुल 2012 में समझ न पाए और खुद को ब्राह्मण प्रस्तुति के चक्र में फंसे l

शायद यह कुछ कारण हों क्योंकि मेरे जीवन काल में मैंने य़ह नहीं देखा कि गुरु तेग बहादर साहिब की शहादत के 350th वर्ष पर एक मंच मुस्लिम ने गुरु साहिब को समर्पित Seminar करवाये और अब वन्दे मात्रम पर संगोष्ठी का सिलसिला जारी है, इस पर “वन्दे मातरम गीत का भारतीय लोकतंत्र पर प्रभाव ” पंजाबी में प्रस्तुत की जा रहीं है क्योंकि इस पूरे गीत का गायन जान बूझ कर 13 अगस्त, 2026 को संसद पर किया गया ताकि हिन्दू मानसिकता का प्रदर्शन किया जाए, यही तो दर्शाता है हिन्दू राष्ट्र की ओर बढ़ते कदम, यही कारण नये संसद भवन को हवन से, संसद भवन में सिंहोंल की स्थापना लोकतंत्र से राजतंत्र की ओर अग्रसर क्या भारत का लोकतंत्र सवालों के घेरे में लाकर खड़ा नहीं कर दिया, इसमें कोई शक नहीं जिसकी आशंका संविधान सभा के सिख प्रतिनिधियों ने 26.11.1949 को करते हुए हुक्म सिंह और भूपेन्द्र सिंह मान ने की थी और संविधान सभा से वाक आउट कर गए और संविधान को इस बिना पर रिजेक्ट किया कि इसमें उन वायदों का जिक्र तक नहीं किया , इसलिए यह सिख और मुस्लिम के साथ न्याय नहीं कर सकेगा, इन 75 वर्षों में यही हुआ किस करीने से प्रथम सिखों को फिर अब मुस्लिम को राजनीति नीति निर्माण प्रक्रिया से ही बाहर कर दिया, वन्दे मात्रम गीत उसका जीता जागता सबूत है, इसी को देखते हुए माननीय उच्चतम न्यायालय में W.P(C)No. 001313/2026 Daya Singh vs Union of India प्रस्तुत की है ताकि इस पर चर्चा हो क्या भारत का लोकतंत्र बचेगा अथवा राजतंत्र की भेंट चढ़ जाएगा, जिस बात की आशंका मृणाल पांडे संपादिका हिन्दोस्तान ने 2013 में महसूस की थी “संघ को एक aise व्यक्ति की ज़रुरत थी जो स्वच्छंद होकर संघ के अजेंडा को लागू करे और उसके राज में कोई यह न कह सके धर्म की आड़ लेकर वह वन्दे मात्रम नहीं गाए गा ” मोदी जी ने यह करिश्मा करके दिखा दिया, इस अन्तराल में संघ के अजेंडा को पूर्णतया पूरा किया और वन्दे मात्रम गीत के केवल 2 पद ही नहीं बल्कि पूरे गीत को संसद पटल पर सभी सांसदों ने खड़े होकर 13.08.2026 को गाया, हैरानी तब हुई जब 20 जुलाई 2026 से 11 अगस्त 2026 तक संसद में नहीं आए और एकदम आए और सबने उस गीत को गाया और मॉनसून अधिवेशन खत्म, अब आप ही फैसला करें देश की दशा और दिशा क्या है? इसलिए अब देश का लोकतंत्र हिन्दू बनाम हिन्दू की भेंट चढ़ गया सिख और मुस्लिम केवल वोट वे भी आशंका कब तक यह यक्ष प्रश्न?

यह भी कारण हो सकता लोगों की भावना का , मैं उन सब का आभारी हूँ जो ऐसा सोचते है परंतु उन्हें याद दिला दूँ तब वे कहां जाते है जब सिख और मुस्लिम निशाने पर होते हैं, मैं इसका विवरण करना उचित नहीं मानता l

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