
श्री चैतन्य महाप्रभु श्री राधा माधव मंदिर में श्री चैतन्य महाप्रभु जी के आविर्भाव के उपलक्ष्य में 67वाँ वार्षिक श्री हरिनाम संकीर्तन सम्मेलन प्रारंभ हुआ, जिसकी अध्यक्षता अखिल भारतीय श्री चैतन्य गौड़ीय मठ के वर्तमान आचार्य त्रिदंडी स्वामी श्रीमद् भक्ति विचार विष्णु महाराज जी ने की । महाराज जी ने आज के विषय *चैतन्य महाप्रभु’* जी के बारे में चर्चा करते हुए कहा की महाप्रभु का जन्म श्री जगन्नाथ मिश्र पुरंदर की परम् सौभाग्यवती पत्नी शचीदेवी का अवलंबन करकेसंवत् 1542 विo फाल्गुन की पूर्णिमा तिथि के दिन नवद्वीप में संध्या समय एक नीम वृक्ष के नीचे हुआ।
श्री कृष्ण चैतन्य महाप्रभु त्रिकाल सत्य पुराण पुरुष है । श्री भागवत पुराण में, भविष्य पुराण में, महाभारत में, इस संबंध में बहुत प्रमाण होने से यह बात सिद्ध होती है । विद्या अध्ययन की लीला करते हुए वे बचपन में ही दिग्विजयी निमाई पंडित के नाम से विख्यात हुए । इन्होंने 24 वर्ष तक गृहस्थ लीला का अभिनय करके पतित से भी पतित जीवों में कृष्ण भक्ति संचारित की । 24 वर्ष के बाद इन्होंने संन्यास ग्रहण लीला प्रकाश की और श्री कृष्ण चैतन्य नाम धारण करके बाकी 24 वर्ष श्री पुरी धाम में रहे । जिसमें से 6 वर्ष दक्षिण भारत एवं उत्तर भारत आदि में कृष्ण भक्ति धर्म का प्रचार प्रसार किया तथा शेष केवल 18 वर्ष पुरी धाम में ही बीते । आखिरी के इन 18 वर्षों में प्रारंभ के 6 वर्ष इन्होंने भक्तों के साथ रहकर नृत्य गीत आदि द्वारा प्रेम भक्ति का प्रवर्तन किया तथा बाकी 12 वर्ष श्री कृष्ण विरह क्रान्ता भाव स्वरूपिणी श्रीमती राधा रानी के भाव में विभावित होकर रहे । इन्होंने कभी कछुए की सी आकृति धारण की तो कभी गदगद भाव आदि प्रकाश करके त्रिभुवन को प्रेम में विभोर कर देते । यह सभी लीलाएं उनकी नित्य लीलाएं हैं । आचरण की दृष्टि से जगत के जीवों को श्री कृष्ण भक्ति की शिक्षा देने के लिए स्वयं श्री कृष्ण ही श्री कृष्ण चैतन्य के रूप में प्रकट हुए ।
श्रीचैतन्य महाप्रभु को “प्रेमावतार” ‘करुणावतार” कहा गया है। श्रीराधा को श्रीकृष्ण से प्रेम करके कैसा आनंद मिलता है, उस आनंद का आस्वादन करने के लिए स्वयं श्रीकृष्ण ने श्रीराधा का भाव और उनकी अंग-कान्ति रंग लेकर श्रीचैतन्य रूप में नवद्वीप धाम में अवतार लिया।
जर्मन से आए त्रिदण्डी स्वामी श्रीमद् भक्तयालोक परमाद्वैति महाराज ने कहा कि श्री चैतन्य महाप्रभु जी के अनुसार जीवो पर दया करना और श्री हरिनाम में रुचि रखना ही हमारा सर्वोत्तम धर्म है ।
मायापुर से श्रीमद् भक्ति हृदय निरीह महाराज ने संकीर्तन द्वारा सभागार में उपस्थित लोगों को हरिनाम की मस्ती में नाचने के लिए मजबूर कर दिया।
वृंदावन से श्रीमद् भक्ति शरण अरण्य महाराज, गोवर्धन से श्रीमद् भक्ति निलय गोविंद महाराज, श्रीमद् भक्ति सम्बन्ध पर्वत महाराज, श्रीमद् भक्ति सम्बन्ध अकिंचन महाराज, कोलकाता से श्रीराम ब्रह्मचारी, अनंत राम दास ब्रह्मचारी, दीनबंधु प्रभु, कन्हाई प्रभु, देव प्रसाद ब्रह्मचारी, निताई दास, ऋषिकेश प्रभु विशेष तौर से मंदिर के वार्षिक हरि नाम संकीर्तन में सम्मिलित हुए।
यहां पर नरेंद्र गुप्ता, केवल कृष्ण, अमित चड्ढा, रेवती रमन गुप्ता, राजेश शर्मा, अजीत तलवाड, कपिल शर्मा, मिंटू कश्यप,अजय अग्रवाल, राजीव ढींगरा, हेमंत थापर, प्रेम चोपड़ा, डॉ मनीष, ओम भंडारी,अजय अरोड़ा, गगन अरोड़ा, विजय सग्गड़, राजीव सग्गड़,संजीव खन्ना, कृष्ण गोपाल, दिनेश शर्मा, जगन्नाथ, अंबरीश, गौर, और अरुण गुप्ता उपस्थित थे