

जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में मां बगलामुखी जी के निमित सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणों द्वारा मुख्य यजमान बलविंदर कुमार से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम, गुलमोहर सिटी में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान वैदिक मंत्रोच्चार, यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि और श्रद्धापूर्वक दी गई आहुतियों से समूचा वातावरण भक्तिमय हो उठा। इस पावन अवसर पर धाम के संस्थापक एवं व्यवस्थापक नवजीत भारद्वाज ने माँ भक्तों को प्रवचन से बांधते हुए कहा कि जरा इतिहास के पन्नों को पलटिए और युगों की इस अद्भुत यात्रा को देखिए। बुराई का रूप कैसे बदलता है, राक्षस कैसे अपना चोला बदलता है इसे समझना बहुत जरूरी है।
नवजीत भारद्वाज जी ने माँ भक्तों को समझाते हुए कहा कि सतयुग में जब बुराई ने जन्म लिया, तो वह चार अक्षरों की थी, नाम था *‘‘हिरणाक्ष’’।* त्रेतायुग आया, तो बुराई थोड़ी सिमटी, वह तीन अक्षरों की रह गई नाम पड़ा *‘‘रावण’’।* द्वापरयुग आया, तो बुराई और घटी, वह दो अक्षरों की रह गई नाम बना *‘‘कंस’’* !
और आज… जब यह कलियुग आया है, तो बुराई ने सबसे खतरनाक, सबसे छोटा और सबसे छुपा हुआ रूप ले लिया है। अब वह राक्षस सिर्फ एक अक्षर का रह गया है और वह एक अक्षर है *‘‘मैं’’ (अहंकार)।*
नवजीत भारद्वाज जी माँ भक्तों को प्रवचन द्वारा समझाते हुए कहा कि आज का सबसे बड़ा महिषासुर कोई बाहर नहीं, बल्कि हर इंसान के भीतर बैठा हुआ यही *‘‘मैं’’* है। उन्होंने कहा कि चार अक्षरों वाला हिरणाक्ष बाहर ब्रह्मांड में चुनौती बनकर खड़ा था। उसे मारने के लिए भगवान को नरसिंह अवतार लेना पड़ा। बाहर का राक्षस था, इसलिए सामने से प्रहार किया गया।
त्रेता में राक्षस तीन अक्षरों का रावण बना ज्ञानी था, प्रतापी था, सोने की लंका थी, लेकिन उसके भीतर का अहंकार दस सिर बनकर बोलता था। उसे मिटाने के लिए भगवान राम को मर्यादा पुरुषोत्तम बनकर सेतू बांधना पड़ा। द्वापर में राक्षस दो अक्षरों का कंस बना। सखे संबंधी, अपने ही घर का भेदी और सत्ता का भूखा। कंस मामा बनकर कृष्ण के सामने आया, और भगवान को बाल रूप से ही लीलाएं करनी पड़ीं।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रवचन के माध्यम से माँ भक्तों को समझाया कि अब कलियुग में राक्षस इतना सूक्ष्म हो गया है कि वह बाहर नहीं, बल्कि हमारे सीने के अंदर, हमारी जुबान पर और हमारी सोच में आकर बैठ गया है। वह सिर्फ एक अक्षर का है *‘‘मैं’’। ‘‘मैंने किया’’, ‘‘मेरा परिवार’’, ‘‘मेरी इज्जत’’, ‘‘मेरी कमाई’’, ‘‘मेरे बिना पत्ता नहीं हिलता’’* यह एक अक्षर का राक्षस इंसान को अंदर से खोखला कर रहा है।
नवजीत भारद्वाज जी ने बड़े विनम्रता से माँ भक्तों को संदेश देते हुए कहा कि बड़े-बड़े तीर-कमान इस *‘‘मैं’’* (अहंकार) पर काम नहीं करते। इस दुनिया में जो भी दुखी है, भटका हुआ है, वह इसी एक अक्षर *‘‘मैं’’ (हउमै)* के रोग का मारा है। यह *‘‘मैं’’* रूपी राक्षस बड़ा शातिर है। यह दान, पुण्य, पाठ और सेवा करते वक्त भी साथ आ जाता है ‘ *‘मैंने इतना पाठ किया, मैंने इतनी सेवा की’’।* यह हर नेकी पर पानी फेर देता है। इसे मिटाने के लिए परमात्मा की शरण में जाना चाहिए। जहाँ *‘‘मैं’’* मिटती है, वहीं *‘‘राम’’* बसते हैं।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रवचन के समापन संत कबीरदास जी के दोहे से करते हुए कहाकि
*‘‘जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि है मैं नाही।’’*
*‘‘प्रेम गली अति सांकरी, ता में दो न समाहीं!’’*
आज ही इस एक अक्षर के राक्षस को अपने अंदर से पहचानो। *‘‘मैं’’* को मिटाकर *‘‘तू ही तू’’* (परमात्मा) का सिमरन शुरू करो। जब अंदर से *‘‘मैं’’* मिटेगी तभी असली रूहानी सुकून और परमात्मा का प्रकाश नसीब होगा।
इस अवसर पर राकेश प्रभाकर,पूनम प्रभाकर,रोहित गौतम,योगिता गौतम,सरोज बाला, समीर कपूर,अमरेंद्र कुमार शर्मा, रोहित भाटिया,अजीत कुमार , नरेंद्र,राकेश शर्मा,आशा,रजनी,अमनदीप कौर, अमरेंद्र सिंह, नवीन , प्रदीप, सुधीर, सुमीत,मनीष शर्मा, दानिश, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,मनी राम,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू,संजीव शर्मा,मुकेश,अमनदीप शर्मा, गुरप्रीत सिंह, विरेंद्र सिंह,वरुण, नितिश,रोमी,दीलीप, लवली, लक्की, मोहित , विशाल , अश्विनी शर्मा , रवि भल्ला, भोला शर्मा, जगदीश,निर्मल,अनिल,सागर सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ के उपरांत लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।



