

जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में मां बगलामुखी जी के निमित्त सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान मनीराम से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध मां बगलामुखी धाम, गुलमोहर सिटी में आयोजित हवन यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि, वैदिक मंत्रोच्चार और आहुतियों की सुगंध से पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। इस पावन अवसर पर धाम के संस्थापक एवं व्यवस्थापक नवजीत भारद्वाज ने संत रहीम जी के दोहे *‘‘पावस देखि रहीम मन, कोइल साधे मौन। अब दादुर वक्ता भए, हमको पूछे कौन॥’’* के माध्यम से मां भक्तों को जीवन में वाणी के महत्व, आत्मसंयम और सद्कर्मों की महत्ता से अवगत करवाया।
नवजीत भारद्वाज ने कहा कि मनुष्य की वाणी उसके संस्कारों, ज्ञान, विवेक और व्यक्तित्व का परिचय देती है। जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियां आती हैं, जब ज्ञानी, गुणवान और विवेकशील व्यक्तियों को मौन धारण करना पड़ता है, क्योंकि उस समय ज्ञान और सच्चाई की अपेक्षा शोर-शराबे को अधिक महत्व दिया जाने लगता है।
उन्होंने संत रहीम जी के दोहे की व्याख्या करते हुए कहा कि वर्षा ऋतु में मेंढक अपनी आवाज से वातावरण को गुंजायमान कर देते हैं, जबकि कोयल अपनी मधुर वाणी को शांत कर लेती है। ऐसे में चारों ओर मेंढकों का शोर सुनाई देता है और कोयल की मधुर आवाज कहीं दबकर रह जाती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने माँ भक्तों को कहा कि यह दोहा केवल प्रकृति का वर्णन नहीं करता, बल्कि समाज की एक गहरी सच्चाई को उजागर करता है। जब शोर को महत्व मिलने लगता है, तब ज्ञान की आवाज दबने लगती है। जब दिखावा सम्मान पाने लगता है, तब सच्चाई को अपनी पहचान साबित करनी पड़ती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने कहा कि मां बगलामुखी की उपासना हमें वाणी पर संयम, मन में स्थिरता और विपरीत परिस्थितियों में विवेक बनाए रखने की प्रेरणा देती है। मां के भक्त को अपनी वाणी का उपयोग किसी को अपमानित करने के लिए नहीं, बल्कि सत्य बोलने, दूसरों का मार्गदर्शन करने और धर्म की रक्षा करने के लिए करना चाहिए।
यदि हमारी वाणी से किसी दुखी व्यक्ति को सहारा मिलता है, तो वह वाणी पूजा बन जाती है। यदि हमारे शब्द किसी टूटे हुए मन को हिम्मत देते हैं, तो वह शब्द सेवा बन जाते हैं। और यदि हमारा मौन किसी अनावश्यक विवाद को रोक देता है, तो वह मौन भी साधना बन जाता है।
नवजीत भारद्वाज जी ने माँ भक्तों को समझाते हुए कहा कि कभी-कभी मौन रहना कमजोरी नहीं, बल्कि आत्मसंयम होता है। हर विवाद में बोलना आवश्यक नहीं, हर आरोप का उत्तर देना जरूरी नहीं और हर व्यक्ति को अपनी अच्छाई समझाना भी आवश्यक नहीं। जो व्यक्ति अपने मन पर नियंत्रण रखना सीख लेता है, वह दूसरों की कटु वाणी से भी अपनी शांति को नष्ट नहीं होने देता।
लेकिन यहां एक बात समझना भी जरूरी है। मौन का अर्थ अन्याय के सामने हार मान लेना नहीं है। जहां किसी निर्दोष के साथ अन्याय हो रहा हो, जहां किसी कमजोर का अधिकार छीना जा रहा हो, वहां सत्य और धर्म के पक्ष में आवाज उठाना भी हमारा कर्तव्य है। बुद्धिमानी इसी में है कि हम कब मौन रहें और कब सत्य के लिए बोलें।
प्रवचन के अंत में नवजीत भारद्वाज जी ने माँ भक्तों को कहा कि दुनिया चाहे मेंढकों के शोर में उलझी रहे, आपको अपनी कोयल जैसी मधुरता नहीं खोनी है। संसार आपको पहचाने या न पहचाने, आप अपने संस्कारों को मत छोडि़ए। लोग आपकी अच्छाई की प्रशंसा करें या न करें, आप अच्छे कर्म करना मत छोडि़ए।
इस अवसर पर श्वेता भारद्वाज,राकेश प्रभाकर,पूनम प्रभाकर ,सरोज बाला, समीर कपूर,अमरेंद्र कुमार शर्मा, दिनेश सेठ,सौरभ भाटिया, जानू थापर,दिनेश चौधरी,नरेश,कोमल,वेद प्रकाश, मुनीष मैहरा, जगदीश डोगरा, ऋषभ कालिया,रिंकू सैनी, कमलजीत,बलजिंदर सिंह, धर्मपालसिंह, अमरजीत सिंह, उदय ,अजीत कुमार , नरेंद्र ,रोहित भाटिया,राकेश शर्मा, अमरेंद्र सिंह, प्रदीप, सुधीर, सुमीत ,जोगिंदर सिंह, मनीष शर्मा, डॉ गुप्ता,सुक्खा अमनदीप,परमजीत सिंह, दानिश, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू, गुलशन शर्मा,संजीव शर्मा, रोहित भाटिया,मुकेश, रजेश महाजन ,अमनदीप शर्मा, गुरप्रीत सिंह, विरेंद्र सिंह, अमन शर्मा, ऐडवोकेट शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी, भोला शर्मा,दीलीप, लवली, लक्की, मोहित , विशाल , अश्विनी शर्मा , रवि भल्ला, भोला शर्मा, जगदीश, नवीन कुमार, निर्मल,अनिल,सागर,दीपक,दसोंधा सिंह, प्रिंस कुमार, पप्पू ठाकुर, दीपक कुमार, नरेंद्र, सौरभ,दीपक कुमार, नरेश,दिक्षित, अनिल,कमल, अजय,बलदेव सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।



