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वैवाहिक रिश्ते से इनकार और बच्चों की जिम्मेदारी नहीं लेना मानसिक क्रूरताः दिल्ली HC

दिल्ली उच्च न्यायालय ने कहा है कि वैवाहिक रिश्ते को अस्वीकार करना और निर्दोष पीड़ित बच्चों की जिम्मेदारी लेने से इनकार करना सबसे गंभीर प्रकार की मानसिक क्रूरता है। उच्च न्यायालय ने अपनी अलग रह रही पत्नी से क्रूरता के आधार पर तलाक के अनुरोध संबंधी एक पति की अपील को खारिज करते हुए यह टिप्पणी की और कहा कि क्रूरता का शिकार महिला हुई है, पुरुष नहीं।

अदालत ने कहा कि जीवनसाथी पर लगाए गए विश्वासघात के निंदनीय, निराधार आरोप और यहां तक कि बच्चों को भी नहीं बख्शना, अपमान और क्रूरता का सबसे खराब रूप होगा, जो व्यक्ति के लिए तलाक मंजूर नहीं करने के लिए पर्याप्त है। न्यायमूर्ति सुरेश कुमार कैत और न्यायमूर्ति नीना कृष्ण बंसल की पीठ ने कहा कि तलाक की याचिका खारिज करने वाली कुटुंब अदालत के आदेश को चुनौती देने संबंधी व्यक्ति की अपील में कोई दम नहीं है। पीठ ने कहा कि पति पत्नी के खिलाफ लगाए गए अपने किसी भी आरोप को साबित नहीं कर पाया है और उसने आत्महत्या करने की धमकी देने और आपराधिक मामलों में फंसाने के बारे में अस्पष्ट आरोप लगाए हैं। उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाह एक ऐसा संबंध है जो आपसी विश्वास पर फलता-फूलता है और एक मधुर संबंध में कभी भी किसी की गरिमा को ठेस नहीं पहुंचाई जाती।

व्यक्ति ने कहा है कि वह अपनी पत्नी से सितंबर 2004 में मिला था और अगले साल उसने शादी कर ली। इस व्यक्ति ने आरोप लगाया कि जब वह शराब के नशे में था तब महिला ने उसके साथ यौन संबंध बनाने के बाद उस पर शादी करने का दबाव डाला और बाद में उसे बताया कि वह गर्भवती है। इस व्यक्ति ने आरोप लगाया कि पत्नी आत्महत्या करने की धमकी देती थी और उसके कई पुरुषों के साथ अवैध संबंध थे। महिला ने हालांकि दावा किया कि उसका शारीरिक उत्पीड़न किया गया क्योंकि वह बच्चे पैदा करने में सक्षम नहीं थी और उसकी सहमति के बिना उसकी कई जांच कराई गई।

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