
जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में श्री शनिदेव महाराज जी के निमित सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान विवेक अग्रवाल से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान दिव्य हवन कुंड से निकलती पावन अग्नि की ज्योति, वैदिक मंत्रोच्चारण और भक्तों के जयकारों से पूरा धाम आध्यात्मिक ऊर्जा से ओत-प्रोत हो उठा। इस पावन अवसर पर धाम के पीठ उपासक नवजीत भारद्वाज ने श्रद्धालुओं को आत्मचिंतन और ईश्वर-समर्पण का संदेश देते हुए कहा कि मनुष्य का जीवन तभी सार्थक है, जब वह अपने भीतर बैठे अहंकार, क्रोध, घृणा और स्वार्थ का त्याग कर परमात्मा के चरणों में समर्पित हो जाए।उन्होंने भावपूर्ण प्रार्थना सुनाते हुए कहा, *”हे परमात्मा! आपका कुछ तोड़ने का मन करे, तो मेरा गरूर तोड़ देना।*
*आपका कुछ जलाने का मन करे, तो मेरा क्रोध जला देना।*
*आपका कुछ बुझाने का मन करे, तो मेरी घृणा बुझा देना।*
*आपका कुछ मारने का मन करे, तो मेरी वासनाओं और स्वार्थपूर्ण इच्छाओं को मार देना।*
*और यदि आपका किसी पर प्रेम बरसाने का मन करे, तो एक बार मेरी ओर भी देख लेना।*
*मैं शब्द हूँ, तुम अर्थ हो; तुम बिन मैं व्यर्थ हूँ।”*
नवजीत भारद्वाज ने कहा कि यदि कोई साधक इस प्रार्थना को पूरे मन और श्रद्धा से आत्मसात कर ले, तो उसके आध्यात्मिक जीवन की दिशा ही बदल सकती है। यह केवल शब्दों का संग्रह नहीं, बल्कि उस भक्त की पुकार है जिसने समझ लिया कि परमात्मा से संसार की वस्तुएँ नहीं, बल्कि स्वयं को बदलने की शक्ति माँगनी चाहिए।
उन्होंने कहा कि आज अधिकांश लोग भगवान से धन, पद, प्रतिष्ठा और सुख-सुविधाएँ माँगते हैं, जबकि सच्चा भक्त प्रभु से अपने दोषों को दूर करने की याचना करता है। वह प्रार्थना करता है कि यदि कुछ टूटना ही है तो उसका अभिमान टूटे, क्योंकि अहंकार टूटते ही ईश्वर के द्वार खुल जाते हैं।
प्रवचन के दौरान उन्होंने प्रकृति का उदाहरण देते हुए कहा कि फलों से लदा वृक्ष सदैव झुकता है, जबकि सूखा वृक्ष अकड़कर खड़ा रहता है। उसी प्रकार सच्चा ज्ञानी विनम्र होता है, जबकि अहंकारी व्यक्ति भीतर से रिक्त होता है। विनम्रता ही भक्ति का प्रथम सोपान है।
इस संदर्भ में उन्होंने संत कबीरदास जी का प्रसिद्ध दोहा सुनाया—
*”जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं।*
*प्रेम गली अति साँकरी, तामें दो न समाहिं॥”*
उन्होंने कहा कि जब तक मनुष्य के भीतर “मैं” का भाव बना रहता है, तब तक प्रभु की अनुभूति नहीं होती। जिस क्षण अहंकार समाप्त हो जाता है, उसी क्षण ईश्वर का प्रकाश हृदय में प्रकट होने लगता है।
प्रवचन के समापन पर नवजीत भारद्वाज ने सभी श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि वे प्रतिदिन ऐसी प्रार्थना करें जिसमें संसार नहीं, बल्कि अपने भीतर परिवर्तन की कामना हो। उन्होंने कहा, *”हे प्रभु! मेरे अहंकार की दीवारें गिरा दो, मेरे क्रोध को भस्म कर दो, मेरी घृणा को शांत कर दो, मेरी वासनाओं का अंत कर दो और अपनी असीम कृपा की एक बूंद मेरे जीवन पर भी बरसा दो।* मेरा प्रत्येक शब्द आपका नाम बन जाए, मेरा प्रत्येक कर्म आपकी पूजा बन जाए और मेरा प्रत्येक श्वास आपका स्मरण बन जाए। क्योंकि *मैं शब्द हूँ, आप ही मेरे अर्थ हैं; आपके बिना मेरा जीवन वास्तव में व्यर्थ है।”*
इस अवसर पर समीर कपूर,रोहित भाटिया, ऋषभ कालिया, कमलजीत,बलजिंदर सिंह, उदय ,अजीत कुमार , नवीन , प्रदीप, सुधीर, सुमीत, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,सौरभ,गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू,संजीव शर्मा,मुकेश, ऐडवोकेट शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी,दीलीप, लवली, लक्की, रवि भल्ला, जगदीश, नवीन कुमार, निर्मल,अनिल,सागर,दीपक,दसोंधा सिंह, प्रिंस कुमार, पप्पू ठाकुर, दीपक कुमार, नरेंद्र, सौरभ,दीपक कुमार, नरेश,दिक्षित, अनिल सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ उपरांत विशाल लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।