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प्रभु की आज्ञा को सिर पर रखिए, राह स्वयं बनती जाएगी-नवजीत भारद्वाज

जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में श्री शनि देव महाराज जी के निमित्त सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान राकेश प्रभाकर से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि अपनी दिव्य आभा से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर रही थी। इसी पावन वातावरण में धाम के पीठ उपासक नवजीत भारद्वाज ने रामायण की चौपाई के माध्यम से प्रभु की आज्ञा, विश्वास और समर्पण का गहरा संदेश दिया।
नवजीत भारद्वाज जी ने कहा-
*‘‘प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ।*
*सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा कर करहु॥’’*
इस चौपाई में भक्ति का अत्यंत गहरा रहस्य छिपा है। भगवान को पाने के लिए केवल बड़े-बड़े कर्मकांड ही पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि सबसे जरूरी है कि भक्त प्रभु की आज्ञा को सिर-माथे पर धारण करे। जिस क्षण भक्त के हृदय में यह भाव पैदा हो जाता है कि हे प्रभु! आपकी इच्छा ही मेरी इच्छा है, उसी क्षण अहंकार पीछे छूटने लगता है और समर्पण का जन्म होता है।
उन्होंने कहा कि रामायण का यह प्रसंग हमें बताता है कि प्रभु श्रीराम की आज्ञा भक्त अंगद के लिए कोई बोझ नहीं थी, बल्कि उनके लिए वह सबसे बड़ा सौभाग्य थी। उन्होंने प्रभु की आज्ञा को अपने सिर पर रखा और आगे बढ़ गए। उन्हें रास्ते की कठिनाइयों से अधिक भरोसा अपने प्रभु पर था। जिस रास्ते पर प्रभु स्वयं ले जा रहे हों, वहां कठिनाइयां जरूर आ सकती हैं, लेकिन अंतत: कल्याण का मार्ग भी वहीं से निकलता है।
नवजीत भारद्वाज ने कहा कि आज मनुष्य भगवान से प्रार्थना तो बहुत करता है, लेकिन भगवान की इच्छा को स्वीकार करना सीख नहीं पाया। हम प्रभु के दरबार में जाकर कहते हैं हे प्रभु! मेरी इच्छा पूरी कर दो। लेकिन सच्चा भक्त इससे एक कदम आगे बढक़र कहता है हे प्रभु! मेरी इच्छा नहीं, अब आपकी इच्छा पूरी हो।
यही दोनों भावों का अंतर है। एक तरफ मनुष्य अपनी इच्छा को भगवान के सामने रखना चाहता है और दूसरी तरफ भक्त स्वयं को भगवान की इच्छा के सामने समर्पित कर देता है। यही समर्पण साधारण मनुष्य को सच्चा भक्त बनाने की दिशा में ले जाता है।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को भगवान के चरणों से जोड़ते हुए कहा कि कभी-कभी जीवन में ऐसी परिस्थितियां आती हैं जब हमारी मेहनत के बावजूद रास्ते बंद दिखाई देते हैं। रिश्ते टूटते हैं, अपने दूर हो जाते हैं, व्यापार में नुकसान होता है, बीमारी या परेशानी घेर लेती है और मनुष्य सोचने लगता है कि आखिर मेरे साथ ही ऐसा क्यों? लेकिन शायद उस समय प्रभु हमें रोक नहीं रहे होते, बल्कि किसी गलत रास्ते से बचाकर अपने रास्ते पर ला रहे होते हैं। हमारी आंखें केवल आज देखती हैं, लेकिन प्रभु हमारी पूरी यात्रा देखते हैं। इसलिए जो भक्त प्रभु की आज्ञा को स्वीकार करना सीख जाता है, उसके भीतर धीरे-धीरे शिकायत समाप्त होने लगती है और समर्पण जन्म लेने लगता है।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रवचन के अंत में प्रभु भक्तों को दोहे का सार समझाते हुए कहा कि अंगद जी ने भी अपने जीवन में यही सिद्ध किया। उनके लिए श्रीराम की आज्ञा ही जीवन का उद्देश्य था। समुद्र कितना विशाल है, रास्ता कितना कठिन है, सामने कितनी बाधाएं हैं इन प्रश्नों से अंगद जी नहीं रुके। क्योंकि उनके हृदय में केवल एक विश्वास था।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रसिद्ध दोहे का अनुसरण करते हुए कहा कि *‘‘राम काज कीन्हें बिनु, मोहि कहाँ विश्राम।’’* यही विश्वास भक्त को असंभव कार्य करने की शक्ति देता है। आज हमें भी अपने जीवन में यह भाव लाने की आवश्यकता है। जब कोई कठिन परिस्थिति आए तो तुरंत टूटने के बजाय प्रभु के चरणों में बैठकर कहना चाहिए। हे प्रभु! अगर यह परीक्षा है तो मुझे धैर्य देना, अगर यह मेरी गलती है तो मुझे सुधार देना, अगर यह मेरी राह नहीं है तो मुझे इससे दूर कर देना, और अगर यह आपकी इच्छा है तो इसे स्वीकार करने की शक्ति देना।
इस अवसर पर श्वेता भारद्वाज, पूनम प्रभाकर,विक्की अग्रवाल,रोहित भाटिया,विवेक अग्रवाल, जानू थापर, ऋषभ कालिया, नरेंद्र ,रोहित भाटिया,राकेश शर्मा, सुधीर,मनीष शर्मा,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा, प्रवीण,राजू,संजीव शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी,दीलीप, लवली, लक्की, विशाल, रवि भल्ला,जगदीश निर्मल,अनिल,सागर,दसोंधा सिंह, प्रिंस कुमार, पप्पू, नरेंद्र, सौरभ, नरेश,दिक्षित, अनिल, कमल, अजय सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।
हवन यज्ञ उपरांत विशाल लंगर भंडारे का आयोजन किया गया।

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