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1984 नरसंहार के पीड़ितों ने राहुल गांधी को दी खुली बहस की चुनौती*

चंडीगढ़, 4 नवंबर ( ): ‘जख्म 84’ सम्मेलन के दूसरे सत्र ‘सिख नरसंहार: कब और कैसे’ के दौरान 1984 के सिख नरसंहार के पीड़ितों ने अपने साथ हुई दिल दहला देने वाली घटनाओं और न्याय के लिए दशकों से जारी संघर्ष की दास्तान साझा की। इस अवसर पर निरप्रीत कौर, सतपाल कौर, दर्शन कौर, सोनिया कौर, जगशेर सिंह सहित कई अन्य पीड़ितों ने सत्र में हिस्सा लिया।
नरसंहार के दौरान पीड़ित परिवारों के साथ हुई घटनाओं का जिक्र करते हुए बीबी निरप्रीत कौर ने बताया कि कैसे उन्होंने महज 16 वर्ष की उम्र में अपने परिवार को उजड़ते देखा और किस तरह न्याय के लिए लंबी लड़ाई लड़नी पड़ी। पीड़ितों ने कांग्रेस पर माफी न मांगने और उनके जख्मों पर मरहम न लगाने का आरोप लगाते हुए राहुल गांधी को खुली बहस की चुनौती दी।
सत्र का संचालन करते हुए आर.पी. सिंह ने चर्चा की शुरुआत में कहा कि राहुल गांधी आजकल बहस की चुनौतियां दे रहे हैं, इसलिए वह भी उन्हें चुनौती देते हैं कि वे रविशंकर प्रसाद, एच.एस. फूलका और बीबी निरप्रीत कौर के साथ 1984 के नरसंहार पर बहस कर लें। इसके बाद अपनी बात रखने वाले पीड़ितों ने बार-बार यही दोहराया कि राहुल गांधी अपने परिवार, कांग्रेस पार्टी और कांग्रेस सरकारों की सिख नरसंहार में भूमिका पर बहस करें। पीड़ितों ने इस नरसंहार को एक सुनियोजित साजिश करार देते हुए कांग्रेस पर माफी न मांगने और न्याय न दिलाने के आरोप लगाए।

*निरप्रीत कौर की कहानी*
निरप्रीत कौर ने बताया कि 1984 के नरसंहार के समय उनकी उम्र 16 वर्ष थी और उनका परिवार पावर कॉलोनी में रहता था। 31 अक्टूबर को बलवान खोखर उनके घर आया और उनके भाई को ड्राइवर रखने की बात कही। हालांकि, उनके अनुसार यह परिवार के सदस्यों की संख्या जानने का एक बहाना था।
उस रात दो पुलिसकर्मी सुरक्षा का भरोसा दिलाते हुए उनके घर आए । अगले दिन बलवान खोखर, कृष्ण खोखर और अन्य लोगों की कथित संलिप्तता वाली भीड़ ने उनके घर को घेर लिया। उनके नौ वर्षीय भाई को ‘सांप का बच्चा’ कहकर मारने के लिए भीड़ को उकसाया गया। उनके पिता ने बच्चों को बचाने का प्रयास किया और परिवार ने करीब चार घंटे तक भीड़ का सामना किया।
उनके ट्रक को आग लगा दी गई। पुलिस द्वारा समझौते के नाम पर दबाव बनाने के बाद दोबारा हमला किया गया।
निरप्रीत कौर ने सज्जन कुमार पर पुलिस जीप के आगे खड़े होकर भीड़ को सिखों के खिलाफ भड़काने का आरोप लगाया। एयरफोर्स के विंग कमांडर एन.एस. पन्नू की मदद से कई लोगों की जान बचाई जा सकी।
उन्होंने बताया कि उन्हें टाडा के तहत जेल जाना पड़ा और तिहाड़ जेल में भी रहना पड़ा। उनके पति को भी कथित फर्जी पुलिस मुठभेड़ में मार दिया गया। नानावती आयोग और उनके पिता का मामला दोबारा खुलने के बावजूद न्याय की लड़ाई लंबी चलती रही।

*महिलाओं के साथ किस तरह किए गए अत्याचार*
इस अवसर पर भागी कौर ने बताया कि किस तरह महिलाओं को निर्वस्त्र करके बैठाया गया और पूरी रात कई लोगों ने उनके साथ दुष्कर्म किया।
बताया गया कि किशोरी लाल नाम के एक कसाई ने अपने दात (मांस काटने वाले हथियार) से सात सिखों की हत्या की थी और उसकी फांसी की सजा को उम्रकैद में बदलवाने के कांग्रेस की शीला दीक्षित सरकार द्वारा प्रयास किए गए।
सतपाल कौर ने बताया कि जब वह 11 वर्ष की थीं, तब पड़ोसियों ने उनके चार बहनों को चारपाई के नीचे छिपाकर उनकी जान बचाई थी। बाद में उन्हें नारी निकेतन में रखा गया, जहां एच.एस. फूलका ने उन्हें ढूंढा और अदालत के माध्यम से उनके नाना को उनकी कस्टडी दिलवाई।
अपनी तीन बहनों का पालन-पोषण करने के लिए सतपाल कौर को घरों में महज 20-20 रुपये में बर्तन मांजने पड़े। उन्होंने बताया कि उन्हें न तो नौकरी मिली और न ही पेंशन।

*कैप्टन घुम्मन की हत्या*
एक अन्य पीड़ित ने सेवानिवृत्त कैप्टन घुम्मन सिंह चाहल की हत्या का जिक्र किया, जिन्होंने चार युद्ध लड़े थे। पैरालाइज्ड होने के बावजूद उन्हें उनके ही घर में जिंदा जला दिया गया और आग में उनके पुत्र की शैक्षणिक डिग्रियां भी जलकर राख हो गईं।
जगशेर सिंह ने बताया कि उन्होंने 18 वर्ष की उम्र में पालम में हिंसा देखी थी। उस दौरान पंडित राम अवतार ने उन्हें शरण दी थी। उन्होंने सज्जन कुमार पर भीड़ को भड़काने के आरोपों का जिक्र किया और बताया कि सिख रेजिमेंट तथा एयरफोर्स ने लोगों को बचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
उन्होंने सीबीआई जांच और अदालतों में गवाही देने के दौरान सामने आई मुश्किलों को भी साझा किया।

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