

जालंधर: मेरे विचार में, किसी पूर्व न्यायाधीश की आलोचना को केवल उसके पद या वरिष्ठता के कारण सही नहीं मान लेना चाहिए। इसी तरह, जस्टिस कौल के अपने फैसलों और विचारों पर सवाल उठाना भी जायज़ है।
जस्टिस कौल भी कोई दूध के धुले नहीं थे।
वे भी इंसान थे और उनके विचारों तथा फैसलों की भी पड़ताल होनी चाहिए। लेकिन किसी खास मामले में उनकी गलती साबित करने के लिए तथ्य और सबूत जरूरी हैं।
ऐसे तथ्य बहुत से जस्टिस कौल द्वारा दिए गए फैसले में मौजूद हैं। मेरे पास उनका एक ऐसा फैसला है जो संविधान और कानून की दृष्टि में ग़लत है,मैं यह साबित कर सकता हूँ
पर कौन कहे रानी अगा डक ?
इस मामले में एक और बात महत्वपूर्ण है। जस्टिस कौल ने जस्टिस चंद्रचूड़ पर न्यायाधीशों की नियुक्तियों के मामले में सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा नरमी बरतने के आरोप लगाए हैं। जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि उन्होंने किताब नहीं पढ़ी है, इसलिए वे विस्तार से जवाब नहीं दे सकते। उन्होंने कॉलेजियम की बैठकों को सम्मानजनक और फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताया है।
मेरी नजर में, जस्टिस कौल की आलोचना को भी उसी कसौटी पर परखना चाहिए, जिस कसौटी पर वे जस्टिस चंद्रचूड़ को परख रहे हैं।
अगर उनके पास तथ्य हैं, तो उनकी बात सुनी जानी चाहिए। लेकिन सेवानिवृत्ति के बाद किसी सहयोगी न्यायाधीश की सार्वजनिक आलोचना करते समय उसके समय, तरीके और उद्देश्य पर सवाल उठाना भी गलत नहीं है।
न्यायपालिका में किसी को भी सवालों से ऊपर नहीं होना चाहिए—न जस्टिस कौल और न ही जस्टिस चंद्रचूड़।


