

जालंधर:- मां बगलामुखी धाम गुलमोहर सिटी नज़दीक लमांपिंड चौंक जालंधर में श्री शनि देव महाराज जी के निमित्त सामुहिक निशुल्क दिव्य हवन यज्ञ का आयोजन मदिंर परिसर में किया गया।
सर्व प्रथम ब्राह्मणो द्वारा मुख्य यजमान कुनाल कपूर से विधिवत वैदिक रिती अनुसार पंचोपचार पूजन, षोडशोपचार पूजन ,नवग्रह पूजन उपरांत सपरिवार हवन-यज्ञ में आहुतियां डलवाई गई।
सिद्ध माँ बगलामुखी धाम में आयोजित दिव्य हवन यज्ञ के दौरान यज्ञ कुंड में प्रज्वलित पावन अग्नि अपनी दिव्य आभा से पूरे वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से आलोकित कर रही थी। इसी पावन वातावरण में धाम के पीठ उपासक नवजीत भारद्वाज ने पंजाबी सूफी कवि शाह हुसैन के प्रसिद्ध कलाम की कुछ पंक्तियों की व्याख्या करते हुए कहा कि
*‘‘मन अटकेया बेपरवाह दे नाल*
*उस दीन-दुनिया दे शाह दे नाल।*
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को कलाम की पंक्तियां का अर्थात् समझाते हुए कहा कि ये केवल दो पंक्तियां नहीं हैं, बल्कि इंसान की पूरी आध्यात्मिक यात्रा का सार हैं। हमारा मन दिन-रात किसी न किसी चीज में अटका रहता है। कभी धन में, कभी परिवार में, कभी मान-सम्मान में, कभी अपनी इच्छाओं में और कभी इस बात में कि दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को संबोधित करते हुए कहा कि मन आखिर अटका किसके साथ है? अगर मन संसार के साथ अटक गया, तो चिंता साथ आएगी। अगर मन मोह-माया के साथ अटक गया, तो डर साथ आएगा। अगर मन अहंकार के साथ अटक गया, तो अशांति साथ आएगी। लेकिन अगर मन उस बेपरवाह मालिक के साथ अटक जाए, तो इंसान के भीतर एक अलग ही शांति जन्म लेती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने पंक्तियां की गहराई समझाते हुए कहा कि ‘‘मन अटकेया’’ मन का अटकना क्या है? मन को रोकना आसान नहीं है। शरीर मंदिर में बैठा हो सकता है, लेकिन मन बाजार में घूम रहा होता है। हाथ माला फेर रहे होते हैं, लेकिन मन हिसाब-किताब कर रहा होता है। हम भगवान का नाम ले रहे होते हैं, लेकिन भीतर चिंता चल रही होती है।
उन्होंने कहा कि संतों ने केवल पूजा करने की बात नहीं कही, उन्होंने मन को जोड़ने की बात कही। जिस दिन मन वास्तव में परमात्मा से जुड़ गया, उस दिन भक्ति केवल पूजा नहीं रहती, भक्ति जीवन बन जाती है।
नवजीत भारद्वाज जी ने प्रभु भक्तों को एक उदाहरण देते हुए कहा कि जैसे लोहे का टुकड़ा चुंबक के पास जाकर आकर्षित होने लगता है, वैसे ही जब मन बार-बार प्रभु के नाम, प्रभु के प्रेम और प्रभु की याद में लगाया जाता है, तो धीरे-धीरे उसकी दिशा बदलने लगती है।
नवजीत भारद्वाज जी कहा कि ‘‘बेपरवाह दे नाल’’- वह बेपरवाह कौन है? यहां ‘‘बेपरवाह’’ शब्द बहुत गहरा है। उस परम सत्ता को बेपरवाह कहते हैं। जब मन उस बेपरवाह मालिक से जुड़ता है, तो इंसान भी धीरे-धीरे संसार की छोटी-छोटी बातों से ऊपर उठना सीखता है।
उन्होंने कहा कि इसका अर्थ यह नहीं कि इंसान अपने कर्तव्यों को छोड़ दे। परिवार संभालो, काम करो, व्यापार करो, जिम्मेदारियां निभाओ लेकिन मन की चाबी संसार के हाथ में मत दो। क्योंकि जिस दिन संसार आपकी खुशी की चाबी अपने हाथ में ले लेता है, उस दिन आपकी खुशी भी संसार के हिसाब से चलने लगती है।
नवजीत भारद्वाज जी पंक्ति का अनुसरण करते हुए कहा ‘‘दीन-दुनिया दे शाह दे नाल’’ अर्थात- मेरा मन उस मालिक के साथ जुड़ गया है, जो दीन और दुनिया दोनों का शाह है। प्रवचन के अंत में उन्होंने कहा कि यह पंक्तियां हमें यही सिखाती है कि मन को उस मालिक से जोड़ो, जो तुम्हारे बोझ को भी जानता है और तुम्हारे रास्ते को भी।
इस अवसर पर राकेश प्रभाकर,पूनम प्रभाकर ,सरोज बाला, समीर कपूर,प्रदीप , दिनेश सेठ,रोहित भाटिया,जानू थापर,नरेश,कोमल, ऋषभ कालिया, कमलजीत,बलजिंदर सिंह,अजीत कुमार,नरेंद्र,राकेश शर्मा,प्रदीप, सुधीर, सुमीत,मनीष शर्मा,दानिश, रितु, कुमार,गौरी केतन शर्मा,सौरभ ,शंकर, संदीप,रिंकू,प्रदीप वर्मा, गोरव गोयल, मनी ,नरेश,अजय शर्मा,दीपक , किशोर,प्रदीप , प्रवीण,राजू,मुकेश,विरेंद्र सिंह, अमन शर्मा,वरुण, नितिश,रोमी, भोला शर्मा,दीलीप, लवली, लक्की, अश्विनी शर्मा,रवि भल्ला,निर्मल,अनिल,सागर,प्रिंस कुमार, पप्पू ठाकुर,नरेंद्र,सौरभ,नरेश,दिक्षित सहित भारी संख्या में भक्तजन मौजूद थे।



