
चंडीगढ केन्द्रीय सिंघ सभा के प्रांगण में एक सिख विद्वत जन की बैठक सिख और पंजाब के लटकता मसलों पर हुई, संचालन नवीकरण सिंघ ने किया । उन्होने 12 मुद्दों को रेखांकित किया ,मुझे भी उसमें शामिल होने हेतु न्योता मिला , मैंने ध्यान आकर्षित करते हुए बताया कि यह एक अच्छा कदम है, परन्तु कुछ मसलों जैसे ब्ल्यू स्टार आप्रेशन और 1984 के सिखों के लिए संसद पटल पर माफी देश के प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह ने ही मांग ली थी, अकाली दल ने आगे कदम ही नही बढाया वह मौका था एक सौहार्द वातावरण था ।
इतिहास को हम न पढना चाहते हैं न समझना चाहते हैं, गांधी की हत्या क्यों की गई, संघ सदैव ही हिंदू राष्ट्र के लिए समर्पित उसे अहसास रहा कि इसका विरोध सिख और मुस्लिम, इन्ही को गांधी नेहरु और कांग्रेस ने आश्वसन दिए थे उनके हक हकूक और उनके धर्म संस्कृति को सुरक्षित रखा जाए गा ताकि गांधी इसके लिए दबाव न बनाए, गांधी ही था जिस को अहसास था कि देश को आजाद करवाने में सिख और मुस्लिम का विशेष योगदान । सविंधान सभा में उन आश्वासनों को नजरअंदाज कर दिया गया जिस कारण हुक्म सिंह और भूपिन्द्र सिंह सविंधान सभा से 26.11.1949 जिस दिन सविंधान को स्वीकार करना था वे वाक आउट कर गए और हस्ताक्षर भी नहीं किए। हमें यह भी समझना होगा बाद में वही हुक्म सिंह संसद में उप सभापति और सभापति भी, वही पंजाब पुनर्गठन संसदीय कमेटी के अध्यक्ष भी, हालांकि वे पंजाब को विशेष राज्य के तौर पर जिस का आश्वासन नेहरू गांधी और कांग्रेस ने किया था पर पंजाब को विभाजित के हक में नहीं थे, जब गुलजारी नन्दा से इंदिरा गांधी प्रधान मंत्री ने इसके बारे में जानना चाह तो यह बताया गया कि हुक्म सिंह पुनर्गठन के हक में नहीं , उन्ही दिनों पूर्व मंत्री पंजाब सरकार और आर्य समाज के नेता ने हुक्म सिंह के समक्ष हरियाणा का प्रस्ताव पेश कर दिया जवाब में हुक्म सिंह ने कहा “प्रो साहिब आपने मुझे धर्म संकट से बचा लिया। अब पंजाब पुनर्गठन को कोई रोक नहीं सकता ” । अफसोस कि अकाली दल उस समय सभी मुद्दे हल करवा सकता था पर ऐसा न हो सका 1967 राम मनोहर लोहिया का कांग्रेस मुक्त ने नये हालात पैदा किए अकाली दल उस का हिस्सा बन गया जिस में जनसंघ को पहचान मिली , शायद सिख इससे भी ना वाकिफ। हिंदी हिंदु हिंदुस्तान का नारा किसने लगाया, आनंदपुर साहिब प्रस्ताव को खालिस्तान किसने प्रचार किया यह सवाल उनसे किसी ने पूछे जो आज पंजाबियत का दावा करते हैं, जब इंदिरा गांधी 1974 में वैसा ही प्रस्ताव जैसा बंगाल में जयोति बाबू के समक्ष था उस से क्यों इंकार किया नतीजतन संघ के जाल में किसने फंसाया , गलतियाँ तो हम करें दोषी कहें शैतान को ।
एक बात करनी बहुत जरूरी है सिख गुरू साहिब ने पांच बिन्दुओं पर पाखण्ड , जातिवाद, शोषण, नशा और भय मुक्त समाज की अवधारणा की यही है समाजवाद और साम्यवाद का दर्शन परन्तु अम्बेडकर ने संविधान के अनुछेद 25(2)(ब) में हिंदू में बौद्ध, जैन और सिख शामिल हैं इससे सिख चिंतन पर कुप्रभाव पड़ा पर हिंदू को परिभाषित ही नहीं किया गया , एक समस्या और खड़ी कर दी अनुसूचित जाति /जन जाति को आरक्षण तब तक जब तक वह हिंदू , ताकि हिंदू बहुसंख्यक जबकि हिंदू तो केवल 12 फीसद से अधिक नहीं , इसका खुलासा वर्तमान की जरूरत, खुद अम्बेडकर ने माना ” मैं पैदा हिंदू हुआ मरूंगा हिंदू नही” , बौद्ध हो गये , यही अंतर विरोध और यही है विडम्बना भी
आज जब पंजाब को सिख राजनीति विहीन करने की ओर देश बढ़ रहा है अन्यथा आम आदमी पार्टी को पंजाब पर किसने थोपा , इसमें कोई संदेह नहीं जितना नुकसान बादल ने किया शायद ही कोई कर सके तो क्या अकाली दल का ही सफाया कर दिया जाए यह यक्ष प्रशन? सिखों ने तो अपने गौरव मयी इतिहास को ही नहीं सुरक्षित रखा, अभी गुरु तेग बहादर साहिब की शहादत के 350वें वर्ष को ही तिलक जनेऊ की रक्षा के लिए समर्पित कर दिया, मुझे लगा औरंगजेब का नाम होगा मुस्लिम निशाने पर, मैंने सवाल किया गुरु नानक से गुरू गोबिन्द सिंह तक उधर बाबर से औरंगजेब तक मित्रवत सम्बंध रहे, इसमें कोई संदेह नहीं गुरु अरजन साहिब और गुरू तेग बहादर साहिब की शहादत जहांगीर और औरंगजेब के समय पर भूल गए उनके पीछे के सच को, मुगल सलतनत में ब्रहमन सलाहकार, राजपूत फौजदार और वैश्य वित्त संचालक वही तो अधिकारी थे तिलक और जनेऊ धारण कर ने के और मन्दिर संचालन के शेष तो शोषित जिस का नेत्रतव गुरु साहिब ने किया, आज सिख कहां खड़ा है, एक प्रयास किया गुरु तेग बहादर साहिब की शहादत के 350वें वर्ष को समर्पित हक ए अमन सम्मेलन आयोजित मुस्लिम विद्वत जनों के सौजन्य से 24 अगस्त 2025 को इन्डिया इसलामिक क्लचरल केन्द्र दिल्ली 4 अक्तुबर 2025 को जयपुर और फिर 4 जनवरी 2026 को पूना और अब 18 जुलाई 2026 को केंद्रीय सिंघ सभा चंडीगढ के सौजन्य से आयोजित किया जा रहा है उस में अपेक्षित सलमान खुर्शीद पूर्व विदेश मंत्री, फारूक अब्दुल्ला पूर्व मुख्य मंत्री जम्मू-कश्मीर, माननीय पूर्व मुख्य न्यायाधीश इकबाल अंसारी, मुहम्मद अदीब पूर्व सदस्य राज सभा एवं अध्यक्ष आई,एम,सी आर , मौलाना सलीम इंजीनियर महासचिव जमायते इस्लामी हिंद, और अन्य गणमान्य जन शामिल होंगे । मैंने महसूस किया कि सिख, मुस्लिम, जाट, गुजर अहीर और मराठा आदि इस विचार से आगे बढ़े। इससे नफरत की दीवार टूटी और आपसी सदभाव का प्रसार भी । इसलिए यह कहना सिखों के प्रति कोई नफरत का माहौल है ऐसा नहीं बल्कि सिख कड़ी है हिंदू और मुस्लिम के बीच इसे सम्भाल कर रखना हम सबका कर्तव्य।