
अटल ने कहा था भारत इस लिए धर्म निरपेक्ष क्योंकि हिन्दू बहू संख्यक परन्तु हिन्दू को परिभाषित नहीं किया कि हिन्दू कौन? जबकि हिन्दू का मुस्लिम से, हिन्दू का इसाई से, हिंदू का सिख से, हिन्दू का बौद्ध से, हिन्दू का जैन से यहीं बस नहीं हिन्दू का आर्य से विवाद क्योंकि ये सभी हिन्दू दावा करते हैं हिन्दू नहीं l यह भी सवाल सदा से रहा हिन्दू की उतपत्ति का राज क्या है क्योंकि जिसे हिन्दू ग्रंथ मानने का ढोंग किया जाता है उन किसी में हिन्दू शब्द नहीं, यहां तक तुलसी रचित राम चरित मानस में भी नहीं फिर भी हिन्दू होना गर्व का ढढोरा पीटा जाता है जैसा दावा अटल बिहारी वाजपेयी ने किया कि हिन्दू के बहु संख्यक के कारण भारत धर्म निरपेक्ष l
भारत के संविधान में भी हिन्दू की व्याख्या नहीं की गयी केवल अनुच्छेद 25(2)(b) में बताया गया हिन्दू में शामिल बौद्ध जैन और सिख जबकि ये तीनों उस विचारधारा के खिलाफ जिसे वैदिक अथवा सनातन बताया जाता है l अम्बेडकर ने भी कहा था वह पैदा हिन्दू हुआ परन्तु मरेगा हिन्दू नहीँ, बौद्ध हो गए l अफ़सोस भारत के संविधान में उन्होंने हिन्दू में बौद्ध को शामिल कर दिया कितनी विडंबना है? बस यही राज़ हिन्दू को बहु संख्यक होने दावा l यहीं बस नहीँ, भारत में स्वर्ण और आवरण, सुर और असुर, देव और दानव आस्तिक और नास्तिक, शाषित और शोषित के बीच की खायी सदा से रही l
यह भी बताया जाता रहा स्वर्ण अर्थात ब्राह्मण मुख से, क्षत्रिय राजपूत भुजाओं से, वैश्य पेट से जबकि शूद्र जाँघ के निचले हिस्से से पैदा हुआ उसके कार्यों को भी ब्राह्मण ने तय कर दिया l इसे यूँ भी कहा जा सकता हैं कि ब्राह्मण ही तय करता है कौन कैसे पैदा हुआ अथवा होता हैं यह कैसी विडंबना? गुरु नानक ने भी इस की व्याख्या ज्ञान शब्दँग वेद शब्दँग, वेद शब्दँग ब्राह्मण :, खत्री शब्दँग सूर शब्दँग, शूद्र शब्दँग परा क़ृत : अर्थात ब्राह्मण क्षत्रिय और वैश्य की सेवा सुरुषा के लिए शूद्र तुलसी तो राम चरित मानस ने यह भी बताया “ढोल ग्वार शूद्र पशु नारी, ये सब ताड़न के अधिकारी जबकि गुरु नानक ने स्पष्ट किया “सरब शब्दँग एक शब्दँग जे को जाने भेयो, नानक तांका दास है सोई निरंजन देओ ‘ अर्थात जो सर्व के धर्म को एक ही धर्म (कर्तव्य )मानता हैं उनमें भेद भाव नहीं करता वही धर्म को जानता है, वह नहीं, जिसने भिन्न भिन्न वर्गों धर्म को बांटा हैं l वास्तव में वही हैं जो सबको एक समान मानता है नानक उसका दास है सोई निरंजन देओ वही है निरंजन माया से रहित l
गुरु नानक ने इन विचारों को आधार बना जो क्रान्तिकार कबीर, नामदेव, रविदास, धन्ना, पीपा, रामानंद, बेनी आदि और फरीद का कलाम इस पर काम कर रहे थे उनके विचारों को एकत्र किया उसी के कारण गुरु ग्रंथ की सम्पादना की गयी, इस क्रांति के खिलाफ ही उसी ब्राह्मण वादी विचार ने जो मुग़ल काल के प्रशासन पर काबिज थी उसी ने गुरु नानक विचार के खिलाफ मोर्चा खोल गुरु अरजन की शहादत का कारण जिसे अटल हिन्दू बता रहे हैं मनु स्मृति के विचार को संविधान होने की दुहाई बस यही है टकराव l अम्बेडकर यहीं गलती कर गए हिन्दू में सिख को समाहित कर दिया, लिपि का टकराव नागरी को देव नागरी जबकि गुरुओं ने गुरमुखी लिपि को अपनाया l गुरु ग्रन्थ इसका साकार रूप गुरमुखी को ही सभी बोलियों/भाषाओं के लिए उपयुक्त l
अम्बेडकर ने एक समस्या और खड़ी कर दी वह थी Sc/St को तभी तक आरक्षण का अधिकार जब तक वह हिन्दू परन्तु हिन्दू को परिभाषित नहीं किया इसप्रकार हिन्दू को ही कट्टर हिन्दू वाद में परिवर्तित कर दिया l शोषित जिसके साथ गुरु नानक खड़े थे वास्तव में शोषित से ही सिख शब्द का उद्घोष हुआ और गुरु अर्थात लीडर न कि जिस प्रकार प्रचार किया जाता हैं, यदि शोषित ने मुग़ल काल में धर्म परिवर्तन नहीं किया उसका कारण सिख विचार धारा ही तो l शायद सिख भी यह समझ नहीं पा रहा l
उपरोक्त से यह स्पष्ट है कि हिन्दू एक भर्मित विचार है जिसकी कोई व्याख्या नहीं जो हिन्दू और हिंदुत्व का ढिढोरा पीट रहे हैं और सुप्रीम कोर्ट के फैसला का हवाला देते हैं वे समझ ही नहीं पा रहे जस्टिस वर्मा ने जीवन शैली का नाम दिया जबकि सभी धर्म स्वत् ही जीवन शैली हैं, यहां भी जस्टिस वर्मा ने हिन्दू को परिभाषित नहीं किया शायद स्वर्ण खुद को बहू संख्यक होने के जोड़ तोड़ को स्थापित करने की दौड़ में जबकि उसका संख्याबल 10-12 फीसदी से अधिक नहीं यदि बहुसंख्यक कोई है तो वह सिख विचार ही है, सिख इस बात को समझ ही नहीं पा रहा, यही है
कशमकश